बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१२ बृहत्संहिता
अन्यदप्याह—
वेणीमूले त्रीन् सुतान् कन्यके द्वे कर्णे पुत्रान् पञ्च हस्ते त्रयं च।
अङ्गुष्ठान्ते पञ्चकं चानुपूर्व्या पादाङ्गुष्ठे पार्ष्णियुग्मेऽपि कन्याम् ॥४०॥
यदि 'मुझे कितनी सन्तान होगी' इस तरह के प्रश्नकाल में स्त्री केशपाश का स्पर्श
करे तो तीन लड़के और दो लड़कियाँ, कान का स्पर्श करे तो पाँच लड़के, हाथ का
स्पर्श करे तो तीन लड़के, कनिष्ठा अंगुलि का स्पर्श करे तो एक लड़का, अनामिका का
स्पर्श करे तो दो लड़के, मध्यमा का स्पर्श करे तो तीन लड़के, तर्जनी का स्पर्श करे तो
चार लड़के, अगूठे का स्पर्श करे तो पाँच लड़के और पाँव के अंगूठे का या दोनों
एड़ियों का स्पर्श करे तो केवल एक कन्या कहनी चाहिये॥४०॥
वेणी केशकलापः। तन्मूले पृच्छायां स्पृष्टे त्रीन् सुतान् द्वे कन्यके जनयिष्यसीति
वक्तव्यम्। कर्णे कर्णयुग्मे पुत्रान् पञ्च। हस्ते हस्तयुग्मे त्रयम्। कनिष्ठाङ्गुलेनाऽऽरभ्याङ्गुष्ठान्तं
यावदानुपूर्व्या क्रमेण पुत्रपञ्चकं सूते। तत्र कनिष्ठास्पर्शने एकं पुत्रम्। सुतद्वयमनामास्पर्शने।
मध्यमायां त्रीन्। तर्जन्यां चतुरः। अङ्गुष्ठे पञ्च। पादाङ्गुष्ठस्पर्शे पार्ष्णियुग्मेऽपि स्पृष्टे
कन्यामेकां सूत इति॥४०॥
अन्यदप्याह—
सव्यासव्योरुसंस्पर्शे सूते कन्यासुतद्वयम् ।
स्पृष्टे ललाटमध्यान्ते चतुस्त्रितनया भवेत् ॥४१॥
यदि पूर्वोक्त प्रश्नकाल में स्त्री दक्षिण ऊरु का स्पर्श करे तो दो लड़कियाँ, वाम ऊरु
का स्पर्श करे तो दो लड़के, ललाट के मध्य का स्पर्श करे तो चार लड़कियाँ और ललाट
के अन्त का स्पर्श करे तो तीन लड़कियाँ होती हैं॥४१॥
सव्यं दक्षिणमूरू, तत्संस्पर्शे कन्याद्वयं सुतद्वयं च जनयति। अपसव्ये वामेऽप्येवमेव।
ललाटमध्यान्ते स्पृष्टे यथासंख्यम्। ललाटमध्ये स्पृष्टे चतुस्तनया चतुष्पुत्रा। ललाटान्ते
स्पृष्टे त्रितनया भवेत् स्यादिति। तथा च पराशरः—
'तत्र जठरस्पर्शे गर्भिणीमेवमेव ब्रूयात्। अङ्गुष्ठेन नासास्रोतसि दक्षिणे कुर्याद्
मासान्तरेण गर्भग्रहणम्। वामाद् द्विवर्षान्तरेण। कर्णच्छिद्रे मासद्वयेन। वामे वर्षद्वयेन।
स्तनयोरङ्गुष्ठेनैव स्पर्शे चतुर्भिर्मासैः। पीठमर्दकं कृत्वा चानन्तरमुदरं कण्डूयेदग्रहस्तं
हस्तेनाभिगृह्य वा पृच्छेद् भग्नलौहिकपिठरकुद्दालककुठारश्रुतिचलितपतितभग्नदर्शनशब्दे
प्रादुर्भावे वा गर्भपतनं विन्द्यात्; तथात्रपानपुष्पफलपक्षिद्विचतुष्पदानामन्यद्रव्याणां पुंसंज्ञकानां
दर्शनशब्दप्रादुर्भावे पुंजन्म विद्यात्। स्त्रीसंज्ञानां स्त्रीजन्म। नपुंसकाख्ये नपुंसकानाम्।
पुंसंज्ञमङ्गं संस्पृश्य गर्भिणी पृच्छेत् पुञ्जन्म विन्द्यात्। स्त्रीसंज्ञानां स्त्रीजन्म। नपुंसकाख्येषु
नपुंसकानाम्'।
अथ विशेषः—'वेणीमूलमभिगृह्य पृच्छेत्तदा द्वे कन्यके त्रीन् पुत्रान् जनयिष्यसीति
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