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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

६१४ बृहत्संहिता
अथोपसंहारार्थमाह—
इति निगदितमेतद् गात्रसंस्पर्शलक्ष्म
प्रकटमभिमताप्त्यै वीक्ष्य शास्त्राणि सम्यक् ।
विपुलमतिरुदारो वेत्ति यः सर्वमेत-
न्नरपतिजनताभिः पूज्यतेऽसौ सदैव ॥४४॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायामङ्ग-
विद्याध्याय एकपञ्चाशत्तमः ॥५१॥
सब शास्त्रों को अच्छी तरह देख कर अभीष्ट-सिद्धि के लिये यह अति स्पष्ट
'अवयव-स्पर्शन-लक्षण' कहा गया है। जो अतिशय बुद्धिमान् उदार दैवज्ञ इसको पूर्ण
रूप से जान लेता है, वह सदा राजा और प्रजा से पूजित होता रहता है॥४४॥
इति 'विमला'हिन्दीटीकायामङ्गविद्याध्याय एकपञ्चाशत्तमः ॥५१॥
इतिशब्द उपसंहारे प्रकारे वा। एतद्गात्रसंस्पर्शलक्ष्म अवयवस्पर्शनलक्षणं प्रकटमतिस्फुटं
विरचितम्। किं कृत्वा सम्यगागमतः शास्त्राणि गर्गपराशरादिभिर्विरचितानि वीक्ष्य दृष्ट्वा।
किमर्थम्? अभिमताप्त्यै अभीष्टार्थसिद्धये। यो विपुलमतिर्विस्तीर्णबुद्धिरुदारो ह्यलुब्धं
सर्वं निरवशेषमेतद्वेत्ति जानाति असौ नरपतिभिर्नृपैर्जनताभिर्जनसमूहैर्दैवज्ञः सर्वदैव सर्वकालं
पूज्यते अभ्यर्च्यत इति॥४४॥
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतावङ्गविद्या
नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५१॥