बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०८ बृहत्संहिता
छिन्नभिन्नव्यापन्नहृतमृतावक्षतजग्धदग्धबद्धपाटितरुदितशब्दश्रवणे वा रोगिणां मरणमादिशेत्
इति।
अथ भोजनज्ञानमाह—
अवयवमपि स्पृष्ट्वाऽन्तःस्थं दृढं मरुदाहरे-
दतिबहु तदा भुक्त्वाऽन्नं संस्थितः सुहितो वदेत् ॥२९॥
यदि भीतर के दृढ अंगों को स्पर्श करके श्वास निकालते हुये प्रश्न करे तो प्रश्नकर्ता
अधिक अन्न खाकर प्रसन्न बैठा है—ऐसा दैवज्ञ को कहना चाहिए।।२९।।
अन्तःस्थमभ्यन्तरस्थितमवयवं स्पृष्ट्वा मरुद्वायुमाहरेदुद्गिरेन् पृच्छेत्तदा प्रच्छकोऽतिबहु
अतिप्रभूतमन्नं भुक्त्वा सुहितोऽग्नितृप्तः स्थित इति वदेत् ।।२९।।
अन्यदप्याह—
ललाटस्पर्शनाच्छूकदर्शनाच्छालीजौदनम् ।
उरःस्पर्शात् षष्टिकाख्यं ग्रीवास्पर्शे च यावकम् ॥३०॥
यदि प्रश्नकर्ता ललाट का स्पर्श करे या शूक धान्य ( यव आदि ) का दर्शन करे
तो साठी का चावल, छाती का स्पर्श करे तो षष्टिक ( साठ रात में होने वाला ) धान्य
एवं गर्दन का स्पर्श करे तो यव इसने खाया है—ऐसा कहना चाहिये।।३०।।
ललाटस्पर्शनात् शूकधान्यानां वा दर्शनाच्छालीजौदनं प्रच्छकेन भुक्तमिति वदेत्।
उरःस्पर्शात् षष्टिकाख्यं धान्यविशेषान्नं ग्रीवास्पर्शे च ग्रावकं यवान्नम्।।३०।।
अन्यदप्याह—
कुक्षिकुचजठरजानुस्पर्शे माषाः पयस्तिलयवाग्वः ।
आस्वादयते चोष्ठौ लिहते मधुरं रसं ज्ञेयम् ॥३१॥
यदि प्रश्न के समय कोख, स्तन, पेट और जानु का स्पर्श करे तो क्रम से
प्रश्नकर्त्ता माष ( उड़द ), जल और यव खाकर आया है तथा ओठ को चबावे या चाटे
तो मधुर रस खाकर आया है—ऐसा कहना चाहिए।।३१।।
कुक्षिस्पर्शने माषा मुक्ताः। कुचौ स्तनौ। तत्स्पर्शने पयः क्षीरौदनम्। जठरमुदरम्।
तत्स्पर्शने तिलौदनम्। जानुस्पर्शने यवागूः यावकम्। ओष्ठावास्वादयते लिहते वा प्रष्टा
पृच्छति तदा तेन मधुरं रसं भुक्तमिति ज्ञेयम्।।३१।।
अन्यदप्याह—
विसृक्के स्फोटयेज्जिह्वामाम्ले वक्त्रं विकूणयेत्।
कटुकेऽथ कषायेऽथ हिक्केत् ष्ठीवेच्च सैन्धवे ॥३२॥
यदि प्रश्न के समय में सृक्क ( ओष्ठप्रान्त ) में जिह्वा मारे तो प्रश्नकर्ता खट्टा, मुख
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