बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअङ्गविद्याध्यायः ६०७
हृतपतितक्षतास्मृतविनष्टविभग्नगतो-
न्मुषितमृताद्यनिष्टरवतो लभते न हतम् ॥ २८ ॥
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्त्ता भीतर के अंगों को छोड़ कर बाहर के अंगों का स्पर्श
करे, कफ फेंके, मूत्रोत्सर्ग या मलोत्सर्ग करे, अपने हाथ की वस्तु को गिरावे, अपने शरीर
को झुकावे या अपने अंग को तोड़े तो चोरी गई वस्तु पुनः नहीं प्राप्त करता है तथा
किसी के हाथ में खाली पात्र या चोर को देख कर भी चोरी गई वस्तु नहीं प्राप्त करता
है। अथवा प्रश्न के समय 'हर लिया, गिर गया, कट गया, भूल गया, नष्ट हो गया, टूट
गया, चोरी गया, मर गया आदि अनिष्ट शब्द उत्पन्न हों तो भी चोरी गई वस्तु' पुनः प्राप्त
नहीं होती है ।। २७-२८ ।।
एवंविधैर्निमित्तैः प्रष्टा हतं न लभते। कैरित्याह—अन्तरङ्गमभ्यन्तरस्थितमवयवमवमुच्य
परित्यज्य बाह्यगावयवस्पर्शनं यदि पृच्छकः करोति, अथवा श्लेष्ममूत्रशकृतस्त्यजति
तत्कालं परित्यजति, अथवा करतलस्थं पाणितले स्थितं यत्किञ्चिद्वस्तु पातयेत्।
अथवा भृशमत्यर्थमवनामिताङ्ग अवनमितावयवाङ्गानामेव परिमोटनं चटचटाशब्द-
मुत्पादयति। तथा तत्कालं जनधृतं लोकगृहीतं रिक्तभाण्डमवलोक्य दृष्ट्वा। तथा चौरजनं
तस्करजनमवलोक्य, अथवा हतः पतितः क्षतः अस्मृतो विनष्टो विभग्नो गत उन्मुषितो
मृतः। एषामनिष्टरवतः शब्दश्रवणात्। आदिग्रहणात् कष्टदुष्टानिष्टशीर्णशब्दश्रवणाद् हतं
प्रहृतं न लभत इति। तथा च पराशरः—
'अभ्यन्तरगं स्पृष्ट्वा बाह्यं स्पृशेन्निर्हरणं वा श्लेष्मपुरीषमूत्रत्यागं कुर्याद्धस्ताद्वा
किञ्चित् पातयेत्। गात्राणि वा स्फोटयेत्। क्षतहतपतितमुषितविस्मृतनष्टकष्टदुष्टानिष्ट-
भग्नगतजीर्णशब्दप्रादुर्भावो वा स्यात्। रिक्तभाण्डतस्कराणां दर्शने न प्रष्टा लाभं विन्द्यात्'
इति ।। २८ ।।
अथ पीडार्तानां मरणज्ञानमाह—
निगदितमिदं यत्तत्सर्वं तुषास्थिविषादिकैः
सह मृतिकरं पीडार्तानां समं रुदितक्षतैः ।
नष्ट चिन्ता में प्रतिपादित पूर्वोक्त ( अन्तरङ्ग इत्यादि ) स्थिति यदि तुष ( धान्यों
की भूसी ), हड्डी, विष आदि देखने के साथ अथवा रोने या छींक के साथ हो तो
रोगियों की मृत्यु होती है।
अन्तरङ्गमवमुच्येति आरभ्य यदिदं नष्टचिन्तायां निगदितमुक्तम्। तत्सर्वं तुषास्थिविषादिकैः
सह साकं तथा रुदितक्षतैः सह समं पीडार्तानां रोगिणां मृतिकरं मरणं करोति। आदि-
ग्रहणाच्छिन्नमृतिजग्धपाटितशब्दर्दैरिति। तथा च पराशरः—
'अथ रोगाभिघातच्छर्द्दमूत्रपुरीषोत्सर्गे केशास्थिभस्मतुषविषादीनामशुभानां दर्शने तथा
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