बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअङ्गविद्याध्यायः ६०९
खुजलावे तो कडुआ, हिचकी करे तो कषैला और थूके तो नमक खाया है—ऐसा
कहना चाहिये॥३२॥
जिह्वां रसनां विसृक्के स्फोटयेत् प्रष्टा तदा तेनाम्लं भुक्तम्। वक्त्रं मुखं विकूणयेत्
कटुके भुक्ते। असौ प्रच्छकः कषाये भुक्ते हिक्केत्। सैन्धवे लवणे भुक्ते ष्ठीवेत्॥३२॥
अन्यदप्याह—
श्लेष्मत्यागे शुष्कतिक्तं तदल्पं
श्रुत्वा क्रव्यदं वा प्रेक्ष्य वा मांसमिश्रम्।
भ्रूगण्डौष्ठस्पर्शने शाकुनं तद्
भुक्तं तेनेत्युक्तमेतन्निमित्तम् ॥३३॥
यदि प्रश्नकाल में कफ फेंके तो थोड़ी सूखी तीती वस्तु और मांसभोजी पक्षी को सुने
या देखे तो मांसमिश्रित वस्तु तथा भ्रू, गाल या ओठ का स्पर्श करे तो प्रश्नकर्ता ने पक्षी का
मांस खाया है—ऐसा कहना चाहिये॥३३॥
श्लेष्मपरित्यक्ते शुष्कं नीरसं तिक्तं तदल्पं स्तोकं च भुक्तम्। क्रव्यादं मांसाशिनं
प्राणिनं श्रुत्वा प्रेक्ष्य दृष्ट्वा तन्मांसमिश्रं भुक्तम्। भ्रूगण्डौष्ठस्पर्शने शाकुनं मांसम्। तेन
प्रष्ट्रा तद्भुक्तम्। इत्युक्तमेतत्कथितं निमित्तं चिह्नम्॥३३॥
अन्यदप्याह—
मूर्धगलकेशहनुशङ्ककर्णजङ्घं बस्तिं च स्पृष्ट्वा।
गजमहिषमेषशूकरगोशशमृगमहिषमांसयुग्भुक्तम् ॥३४॥
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता शिर, कण्ठ, ठोढ़ी, केश, कनपटी, कान, जंघा और
बस्ति ( नाभि और लिंग के बीच का स्थान ) का स्पर्श करे तो क्रम से हाथी, भैंस, शूकर,
मेष, गौ, खरगोश, मृग और भैंस के मांस से मिश्रित भोजन किया है—ऐसा कहना
चाहिये॥३४॥
मूर्धादिस्पर्शने यथाक्रमं गजादिमांसं भुक्तं वक्तव्यम्। मूर्धा शिरस्तत्स्पर्शने गजमांसं
कौञ्जरम्। गलस्पर्शने माहिषम्। केशस्पर्शने मेषमांसमौरभ्रम्। हनुस्पर्शने शूकरमांसम्।
शङ्खस्पर्शने गोमांसम्। कर्णस्पर्शने शशमांसम्। जङ्घास्पर्शने मृगमांसम्। बस्तिस्पर्शने
महिषमांसयुतमेव भुक्तम्॥३४॥
अन्यदप्याह—
दृष्टे श्रुतेऽप्यशकुने गोधामत्स्यामिषं वदेद्भुक्तम्।
गर्भिण्या गर्भस्य च निपतनमेवं प्रकल्पयेत्प्रश्ने ॥३५॥
यदि प्रश्नकाल में प्रश्नकर्ता अशकुन देखे या सुने तो गोह या मछली का मांस
खाकर आया है—ऐसा कहना चाहिये। इसी तरह गर्भिणी के प्रश्न में गर्भस्राव की
बृ० भ० प्र०-३९
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