बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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रजतस्य रूप्यस्य दर्शने कौशेयवस्त्रस्य। व्याघ्रस्य सन्दर्शने आभरणागमः। तथा च
पराशरः—
'महिषस्य क्षौमवस्त्रागमम्। मणिभाण्डस्य गजवाजिनामौर्णिकानाम्। व्याघ्रस्या-
भरणागमम्। पङ्कजस्य रक्तवस्त्रचन्दनलाभम्। रूप्यस्य कौशेयवस्त्राणाम्' इति।।१९।।
अन्यदप्याह—
पृच्छा वृद्धश्रावकसुपरिव्राड्दर्शने नृभिर्विहिता।
मित्रद्यूतार्थभवा गणिकानृपसूतिकार्थकृता ॥२०॥
यदि प्रश्नकाल में वृद्ध श्रावक (कापालिक) का दर्शन हो तो मित्र, द्यूत और
धनसम्बन्धी चिन्ता तथा उत्तम संन्यासी का दर्शन हो तो वेश्या, राजा और प्रसूता स्त्री के
लिये चिन्ता कहनी चाहिये।।२०।।
वृद्धश्रावकः कापालिकस्तद्दर्शने तदालोकने नृभिः पुम्भिर्मित्रद्यूतार्थभवा पृच्छा
विहिता कृता मित्रार्थं द्यूतार्थं वा कृता। सुपरिव्राड्दर्शने यत्याद्यवलोकने लिङ्गिनो वा
गणिकानृपसूतिकार्थकृता पृच्छा। गणिका वेश्या। नृपो राजा। सूतिका प्रसूता स्त्री।
तत्कृता।।२०।।
अन्यदप्याह—
शाक्योपाध्यायार्हन्निग्र्रन्थिनिमित्तनिगमकैवर्तैः ।
चौरचमूपतिवणिजां दासीयोधापणस्थवध्यानाम् ॥२१॥
यदि प्रश्नकाल में बौद्धमतानुयायी, उपाध्याय, अर्हत्, निर्ग्रन्थी, दैवज्ञ, निगम और
धीवर दिखाई दे तो क्रम से चोर, सेनापति, बनियाँ, दासी, योद्धा, दुकानदार और वध-
सम्बन्धी चिन्ता कहनी चाहिये।।२१।।
शाक्यादीनां दर्शने चौरादीनां पृच्छा। शाक्यदर्शने चौरकृता। उपाध्यायदर्शने चमूपति-
कृता सेनापतिकृता। अर्हद्दर्शने वणिक्कृता। निर्ग्रन्थिदर्शने दासीकृता। नैमित्तिकस्य दैव-
विदो दर्शने योधकृता। निगमदर्शने आपणस्थस्य श्रेष्ठिनः कृता। कैवर्तस्य धीवरस्य
दर्शने वध्यकृता चिन्ता इति।।२१।।
अन्यदप्याह—
तापसे शौण्डिके दृष्टे प्रोषितं पशुपालनम्।
हृद्गतं प्रच्छकस्य स्यादुञ्छवृत्तौ विपन्नता ॥२२॥
यदि प्रश्नकाल में तापस (तपस्वी) का दर्शन हो तो प्रवासी की और कलाल
(मद्य बेचने वाले) का दर्शन हो तो पशुओं की रक्षासम्बन्धी चिन्ता कहनी चाहिए।
यदि उञ्छ वृत्ति (गिरे हुये एक-एक दाने को इकट्ठा करने वाले) का दर्शन हो तो
विपत्ति की चिन्ता कहनी चाहिए।।२२।।
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