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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 633

खड्गलक्षणाध्यायः ५९१
षष्ठ आदि अङ्गुल में व्रण हो तो क्रम से सुतलाभ आदि फल कहना चाहिये। जैसे
छठे अङ्गुल में व्रण हो तो पुत्रलाभ, सातवें में कलह, आठवें में हाथी का लाभ, नवें में
पुत्रमरण, दशवें में धनलाभ, ग्यारहवें में विनाश, बारहवें में स्त्री की प्राप्ति और तेरहवें
अङ्गुल में व्रण हो तो मन में दुःख होता है॥१७॥
सुतलाभः पुत्राप्तिः षष्ठेऽङ्गुले। कलहः सप्तमे। हस्तिलब्धिर्गजलाभोऽष्टमे। पुत्रमरणं
सुतविनाशो नवमे। धनलाभो वित्तागमो दशमे। विनाशो मरणमेकादशे। वनिताप्तिः
स्त्रीलाभो द्वादशे। चित्तदुःखं त्रयोदशे। एवं षट्प्रभृति षडादिष्वङ्गुलेषु क्रमशः क्रमेण
विनिर्दिशेत् फलम्॥१७॥
अन्येष्वप्याह—
लब्धिर्हानिः स्त्रीलब्धयो वधो वृद्धिर्मरणपरितोषाः ।
ज्ञेयाश्चतुर्दशादिषु धनहानिश्चैकविंशे स्यात् ॥१८॥
यदि चौदहवें अङ्गुल में व्रण हो तो लाभ, पन्द्रहवें में हानि, सोलहवें में स्त्रीलाभ,
सत्रहवें में वध, अट्ठारहवें में वृद्धि, उन्नीसवें में मरण और बीसवें अंगुल में व्रण हो तो
प्रसन्नता होती है तथा इक्कीसवें अंगुल में व्रण हो तो धनहानि होती है॥१८॥
लब्धिरर्थलाभश्चतुर्दशेऽङ्गुले। हानिरर्थनाशः पञ्चदशे। स्त्रीलब्धियोषित्प्राप्तिः षोडशे।
वधो मरणं सप्तदशे। वृद्धिरर्थादीनामष्टादशे। मरणमेकोनविंशे। परितोषश्चित्ततुष्टिर्विंशे।
एवं चतुर्दशादिष्वङ्गुलेषु फलक्षयो ज्ञेयो ज्ञातव्यः। एकविंशे धनहानिर्वित्तनाशः स्याद्
भवेत्॥१८॥
अन्येष्वाह—
वित्ताप्तिरनिर्वाणं धनागमो मृत्युसम्पदोऽस्वत्वम् ।
ऐश्वर्यमृत्युराज्यानि च क्रमात् त्रिंशदिति यावत् ॥१९॥
बाईसवें अंगुल में व्रण हो तो धन का लाभ, तेईसवें में मृत्यु, चौबीसवें में
धनलाभ, पच्चीसवें में मरण, छब्बीसवें में सम्पत्ति, सत्ताईसवें में निर्धनता, अट्ठाईसवें
में ऐश्वर्य, उनतीसवें में मरण और तीसवें अंगुल में व्रण हो तो राज्यलाभ होता
है॥१९॥
वित्ताप्तिर्धनागमो द्वाविंशे। अनिर्वाणं मृत्युस्त्रयोविंशे। धनागमो वित्तलाभश्चतुर्विंशे।
मृत्युर्मरणं पञ्चविंशे। सम्पदोऽर्थादीनां षड्विंशे। अस्वत्वं निर्धनत्वं सप्तविंशे। ऐश्वर्य-
मष्टाविंशे। मृत्युर्मरणमेकोनत्रिंशे। राज्यं त्रिंशे। एवं क्रमात् परिपाट्या त्रिंशद्यावत्फलानि
वक्तव्यानीति॥१९॥
अतः परमाह—
परतो न विशेषफलं विषमसमस्थास्तु पापशुभफलदाः ।
कैश्चिदफलाः प्रदिष्टास्त्रिंशत्परतोऽग्रमिति यावत् ॥२०॥
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