बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्यस्नानाध्यायः ५८१
बहुत बड़ी कीर्ति वाले बृहस्पति ने इन्द्र के लिये यह स्नान कहा था। यह स्नान
आयु और प्रजा की वृद्धि करने वाला तथा सौभाग्य प्रदान करने वाला है।।८६।।
इदं स्नानं बृहस्पतिः सुरगुरुर्बृहत्कीर्तिर्विपुलकीर्तिः, महेन्द्रार्थं देवराजहितार्थमुवा-
चोक्तवान्। कीदृशम्? आयुष्प्रजावृद्धिसौभाग्यकरणम्, आयुषो जीवितस्य प्रजानां सुतानां
च वृद्धिं करोति। सौभाग्यकरणं परं प्रकृष्टम्।।८६।।
अन्यदप्याह—
अनेनैव विधानेन हस्त्यश्वं स्नापयेत्ततः ।
तस्यामयविनिर्मुक्तं परां सिद्धिमवाप्नुयात् ॥८७॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां पुष्य-
स्नानाध्यायाष्टचत्वारिंशः ॥४८॥
जो राजा इस पूर्वोक्त विधि से हाथी और घोड़ों को भी अभिषेक कराता है, रोग से
मुक्त होकर उसके वे हाथी-घोड़े परम सिद्धि प्राप्त करते हैं।।८७।।
इति 'विमला'हिन्दीटीकायां पुष्यस्नानाध्यायोऽष्टचत्वारिंशः ॥४८॥
यो राजा अनेनैव पूर्वोक्तेन विधानेन हस्त्यश्वं गजतुरंगं स्नापयेत् तस्य राजस्तद्धस्त्य-
श्वमामयविनिर्मुक्तं रोगरहितं परां प्रकृष्टां सिद्धिमाप्नुयाल्लभत इति।।८७।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ पुष्यस्नानं
नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४८॥
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