सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 728 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 621

पुष्यस्नानाध्यायः ५७९
इसके बाद राजा बहुत प्रकार के धनों से दैवज्ञ और पुरोहित की पूजा करे तथा
अन्य दक्षिणा देने के लायक श्रोत्रिय आदि की भी यथोचित पूजा करे॥८०॥
अतोऽनन्तरं नृपती राजा दैवज्ञं सांवत्सरं पुरोहितं चाचार्यं बहुभिः प्रभूतैर्धनैर्वित्तैरर्चयेत्।
तथा अन्यान् दक्षिणीयान् दक्षिणार्हान् यथोचितं कुलशीलपाठश्रुतानुसारेण श्रोत्रियप्रभृतीन्
यजमानाग्निहोतृंश्चार्चयेत्। तथा च गर्गः—
दत्वा वित्तं ब्राह्मणेभ्यो गावो हेमपरिष्कृताः।
वास्तु युग्मं मही रूप्यं तेभ्यश्च बहुभोजनम् ।।
शङ्खभेरीस्वनैर्दिद्व्यैर्गजैश्चैव मनोहरैः।
सम्प्रविश्य ततो राजा सचिवैः परिवारितः।।
श्वेतकुञ्जरमारूढः श्वेतमश्वमथापि वा।
श्वेतचन्दनलिप्ताङ्गः श्वेताम्बरधरः शुभः ।।
पुरस्ताद्विकरेद्वित्तमाशीर्वादैश्च पूजितः।। इति ॥८०॥
ततः किं कुर्यादित्याह—
दत्त्वाऽभयं प्रजानामाघातस्थानगान् विसृज्य पशून् ।
बन्धनमोक्षं कुर्यादभ्यन्तरदोषकृद्वर्जम् ॥८१॥
प्रजाओं को अभयदान देकर बध्य स्थानगत पशु (छाग) आदि को छोड़कर
अभ्यन्तर (राजा के शरीर या अन्तःपुर) में जिन्होंने अपराध किया है, उनके सिवाय
समस्त बन्धन स्थानस्थित पुरुषों को मुक्त करे॥८१॥
ततः प्रजानां लोकानामभयं दत्वा आघातस्थानगान् वध्यस्थानप्राप्तान् पशून् छागादीन्
विसृज्य विमुच्य ततो बन्धनमोक्षं कुर्यात्। बन्धनस्थान् पुरुषान् परित्यजेत्। किं त्वभ्यन्तर-
दोषकृद्वर्जम्। अभ्यन्तरे नृपशरीरे अन्तःपुरे वा यैर्दोषः कृतस्तान् वर्जयित्वेत्यर्थः ॥८१॥
अथ पुष्यस्नानमाहात्म्यमाह—
एतत्प्रयुज्यमानं प्रतिपुष्यं सुखयशोऽर्थवृद्धिकरम्।
पुष्याद्विनाध्र्धफलदा पौषी शान्तिः परा प्रोक्ता ॥८२॥
प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में किया हुआ यह स्नान सुख, यश और धन की वृद्धि करने
वाला होता है। पुष्य नक्षत्र को छोड़कर अन्य नक्षत्र में यथाविधि यह स्नान करने से
आधा फल देने वाला होता है। पर पुष्य नक्षत्रयुत पूर्णिमा के दिन का यह स्नान
सर्वोत्कृष्ट है॥८२॥
एतत् स्नानं प्रतिपुष्यं पुष्यं पुष्यं प्रति प्रयुज्यमानं क्रियमाणं सुखयशोऽर्थवृद्धिकरं
सुखस्य यशसेऽर्थस्य वृद्धिकरं भवति। पुष्याद्विना अन्यत्र क्रियमाणमर्धफलं यथोक्तात्
फलादर्धं ददाति। पौषी शान्तिः। पुष्यनक्षत्रेण युता पौषी पौर्णमासी च परा प्रकृष्टा प्रोक्ता
कथिता॥८२॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA