बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्यस्नानाध्यायः ५७५
द्वैपायनो यवक्रीतो देवराजः सहानुजः।
पर्वतास्तरवो वल्ल्यः पुण्यान्यायतनानि च॥६७॥
प्रजापतिर्दितिश्चैव गावो विश्वस्य मातरः।
वाहनानि च दिव्यानि सर्वलोकाश्चराचराः॥६८॥
अग्नयः पितरस्तारा जीमूताः खं दिशो जलम्।
एते चान्ये च बहवः पुण्यसङ्कीर्तनाः शुभैः॥६९॥
तोयैस्त्वामभिषिञ्चन्तु सर्वोत्पातनिबर्हणैः।
यथाभिषिक्तो मघवानेतैर्मुदितमानसैः॥७०॥
सभी देवता तुम्हारा अभिषेक करें—सिद्ध, पुरातन देव ( ब्रह्मा, विष्णु, शिव ),
साध्य, वायु के समुदाय, आदित्य, वसु, रुद्र, वैद्यों में श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार, अदिति,
देवमाता, स्वाहा, सिद्धि, सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, श्री, सिनीवाली ( दृश्यचन्द्रा ),
कुहू ( अदृश्यचन्द्रा अमावस्या ), दनु, सुरसा, विनता, कद्रू, देवपत्नी, देवमाता, दिव्य
अप्सरायें—ये सब तुम्हारा अभिषेक करें। अश्विनी आदि नक्षत्र, मुहूर्त, पक्ष, अहोरात्र
की सन्धि, संवत्सर, सूर्यादि सात ग्रह, कला, काष्ठा, क्षण, लव—ये सब काल के शुभ
अवयव तुम्हारा अभिषक करें। ये सब तथा अन्य भी वेदव्रतपरायण, शिष्य और स्त्रियों
के साथ तपस्वीगण तुम्हारा अभिषेक करें। विमान पर चलने वाले देवतागण, मनु,
समुद्र, नदी, प्रधान नाग, किन्नर, वैखानस, श्रेष्ठ ब्राह्मण, आकाशमार्ग से गमन करने
वाले, स्त्रियों के साथ सप्तर्षि गण, सभी ध्रुवस्थान, मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य,
क्रतु, अङ्गिरा, भृगु, सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, दक्ष, जैगीषव्य, भगन्दर,
एकत, द्वित, त्रित, जाबालि, कश्यप, दुर्वासा, दुर्विनीत, कण्व, कात्यायन, मार्कण्डेय,
दीर्घतप, शुनःशेप, विदूरथ, ऊर्व, संवर्तक, च्यवन, अत्रि, पराशर, द्वैपायन ( व्यास ),
यवक्रीत, भाइयों के साथ देवराज ( इन्द्र ), पर्वत, वृक्ष, लता, पुण्यगृह, प्रजापति,
दिति, गौ, विश्व की मातायें, दिव्य वाहन, चराचर समस्त लोक, अग्नि, पितर, तारा,
मेघ, आकाश, दिशा, जल—ये सब तथा अन्य भी पवित्र कीर्ति वाले, सभी उत्पातों
का नाश करने वाले, पवित्र जल से जिस तरह प्रसन्न चित्त होकर इन्द्र का अभिषेक
किया गया था, उसी तरह तुम्हारा अभिषेक करें॥५५-७०॥
अथ पयोऽभिषेकमन्त्रः सुबोधस्तथापि मन्दबुद्धिव्युत्पादनाय किञ्चिद् व्याख्यायते।
सुरा देवास्त्वां नृपमभिषिञ्चन्तु। ये च सिद्धा देवयोनयः। पुरातनाः ब्रह्माद्याः सुराः।
साध्याः समरुद्गणाः, मरुतां गणैर्वायुसमूहैः सहिताः। भिषग्वरौ वैद्यप्रधानावश्विनौ। अदिति-
र्देवमाता सुरजननी। स्वाहाद्या देवताः। सिनीवाली दृश्यचन्द्रा अमावास्या यस्यां प्रभाते
शशी दृश्यते, नष्टक्षपाकरा अमावास्या कुहूः, यस्यां प्रभाते चन्द्रमा न दृश्यते। दनु-
प्रभृतयः कश्यपपत्न्यः। देवपत्न्यः सुरदाराः। देवमातरः सुरजनन्यः। एताः सर्वास्त्वाम-
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