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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 728 में से

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पृष्ठ 609

अतः परं पूजां कथयामीत्याह—
कथयाम्यतः परमहं पूजामस्मिन् यथाभिलिखितानाम् ।
ग्रहयज्ञे यः प्रोक्तो विधिर्ग्रहाणां स कर्तव्यः ॥२९॥
मांसौदनमद्याद्यैः पिशाचदितितनयदानवाः पूज्याः ।
अभ्यञ्जनाञ्जनतिलैः पितरो मांसौदनैश्चापि ॥३०॥
सामयजुर्भिर्मुिनयस्त्वग्भिर्गन्धैश्च धूपमाल्ययुतैः ।
अश्लेषकवर्णैस्त्रिमधुरेण चाभ्यर्चयेद् नागान् ॥३१॥
धूपाज्याहुतिमाल्यैर्विबुधान् रत्नैः स्तुतिप्रणामैश्च ।
गन्धर्वानप्सरसो गन्धैर्माल्यैश्च सुसुगन्धैः ॥३२॥
शेषांस्तु सार्ववर्णिकबलिभिः पूजां न्यसेच्च सर्वेषाम् ।
प्रतिसरवस्त्रपताकाभूषणयज्ञोपवीतानि ॥३३॥
इसके बाद इस यज्ञ में अभीष्ट देवताओं की पूजन-विधि बताते हैं। यात्रा नामक
पुस्तक के ग्रहयज्ञ प्रकरण में ग्रहों की पूजन विधि जो बताई गई है, उसी तरह यहाँ पर
भी ग्रहों की पूजा करनी चाहिये। मांस, भात, मद्य आदि से पिशाच, दैत्य और दानवों
की पूजा करनी चाहिये। अभ्यञ्जन ( स्निग्ध पदार्थ ), कज्जल, तिल, मांस और भात
से पितरों की; साम तथा यजुर्वेदों के मन्त्र, सुगन्ध द्रव्य, धूप और मालाओं से मुनियों
की; अश्लेषक ( अमिश्रित ) वर्ण और त्रिमधुर ( मधु, घृत और शर्करा ) से सर्पों की;
धूप, घृत, हवन, माला, रत्न, स्तोत्र और प्रणामों से देवताओं की; सुगन्ध द्रव्य, माला
और सुन्दर गन्धों से गन्धर्व तथा अप्सराओं की एवं समस्त वर्णयुत बलियों से शेष
( यज्ञ आदि ) की पूजा करनी चाहिये। पूजन के बीच-बीच में सबको कुङ्कुम से रक्त
किया हुआ सूत्र, वस्त्र, ध्वजा, भूषण और यज्ञोपवीत देना चाहिये॥२९-३३॥
कथयामीति । अतोऽस्मात्परमहमाचार्योऽस्मिन् मण्डले यथाभिलिखितानां विन्य-
स्तानां पूजामर्चां कथयामि वक्ष्यामि। ग्रहाणामादित्यादीनां यात्रायां ग्रहयज्ञे योऽयं विधिः
प्रोक्तः कथितः स एवात्र कर्तव्यः। तद्यथा—
यात्रायां ग्रहयज्ञे तत्रार्चा ताम्रमयसवितुः।
पालांशिकी समिद् वैकङ्कतजाता तथा स्रुक् च।
आकृष्णेति च मन्त्रो रक्ता गन्धाः सहागुरुणा।।
माषाऽतसीतिलालवकमुद्गान् चणकान् विहाय भोज्यविधिः।
वकुलार्कागस्त्यपलाशशल्यकीकुसुमपूजा च।।
अष्टशतसस्मितेभ्यो विप्रेभ्यो दक्षिणा हिताग्निभ्यः।
देया वृषकनक मही सहस्रकिरणं समुद्दिश्य।। इत्यादि।