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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 578

५३६ बृहत्संहिता
विकारयुत शब्द होने से भय होता है, यह मुनि का वचन है।।६२।।
लाङ्गलं हलम्। गोलाङ्गल्योः सङ्गः परस्परं श्लेषः। गौर्यत्र हललग्ना दृश्यते इति
तस्मिंस्तथा दर्वीशूर्पाद्युपस्करविकारे, दर्वी प्रसिद्धा, शूर्पमपि प्रसिद्धमेव। दर्वीशूर्पविकारे।
उपस्करभाण्डानां विकारे वैकृते। आदिग्रहणाम्मुशले उलूखलादि गृह्यते। एषां विकारे स्वरूपा-
न्यत्वे। हसने गायने रोदने वा। क्रोष्टुकः शृगालस्तत्सदृशे तेषांमेव नादे शब्दे शस्त्रभयं
भवति। इदं वक्ष्यमाणमत्रास्मिन्नुत्पाते शान्त्यर्थं मुनिवचः ऋषिवाक्यमिति।।६२।।
तच्चाह—
वायव्येष्वेषु नृपतिर्वायुं शक्तुभिरर्चयेत्।
आवायोरिति पञ्चर्चो जप्तव्याः प्रयतैर्द्विजैः ॥६३॥
ब्राह्मणान् परमान्नेन दक्षिणाभिश्च तर्पयेत्।
बह्वन्नदक्षिणा होमाः कर्तव्याश्च प्रयत्नतः ॥६४॥
इन पूर्वोक्त वायव्य विकारों में सत्तू (सतुआ) से वायु देवता की पूजा करे। नियमयुत
होकर ब्राह्मण 'आवायोः' इत्यादि पाँच ऋचाओं का जप करे। पायस से ब्राह्मणों को
तृप्त करे और प्रयत्नपूर्वक बहुत अन्न की दक्षिणा देकर हवन करे।।६३-६४।।
एषु वायव्येषूत्पातेषु नृपती राजा वायुमनिलं शक्तुभिरर्चयेत् पूजयेत्, तथा प्रयतैः
संयतैर्द्विजैर्ब्राह्मणैरावायोरित्यादिकाः पञ्चर्चो जप्तव्या इति। पञ्च ऋचो जप्तव्यो इति।
परमान्नेन पायसेन दक्षिणाभिश्च ब्राह्मणांस्तर्पयेत् तथा होमा बह्वन्नदक्षिणाः प्रभूतभोज्याः
प्रभूतदक्षिणाः प्रयत्नतश्च कर्तव्या इति।।६३-६४।।
इति वायव्यवैकृतम्
•
अथान्यानप्युत्पातानाह—
पुरपक्षिणो वनचरा वन्या वा निर्भया विशन्ति पुरम्।
नक्तं वा दिसचराः क्षपाचरा वा चरन्त्यहनि ॥६५॥
सन्ध्याद्वयेऽपि मण्डलमाबध्नन्तो मृगा विहङ्गा वा।
दीप्तायां दिश्यथवा क्रोशन्तः संहता भयदाः ॥६६॥
यदि नगर में रहने वाले पक्षी वन में और वन में रहने वाले पक्षी निर्भय होकर नगर
में प्रवेश करें या दिन में चलने वाले पक्षी रात्रि में और रात्रि में चलने वाले पक्षी दिन
में चलें एवं सूर्य के उदय और अस्त समय में वन में रहने वाले पशु और पक्षी सूर्याभि-
मुख होकर मण्डल बाँधकर बैठें या सब इकट्ठे होकर अधिक शब्द करते हुये दिखाई दें
तो भय देने वाले होते हैं।।६५-६६।।
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