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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 579

उत्पाताध्यायः ५३७
पुरपक्षिणो ग्राम्यविहगा यदि वनचरा भवन्ति। वनेऽरण्ये चरन्ति, तथा वन्याः पक्षिणो
निर्भया विगतभीतयो वा पुरं नगरं प्रविशन्ति। अथवा दिवसचराः पक्षिणः काकादयो
नक्तं रात्रौ चरन्ति। क्षपाचरा रात्रिचारिणः कौशिकादयोऽहनि दिवसे चरन्ति।
अन्यानप्याह—मृगा अरण्यप्राणिनः, विहङ्गा पक्षिणो वा सन्ध्याद्वयेऽपि सूर्योदयास्त-
समययोर्मण्डलं चक्राकारमाबध्नन्तो रचयन्तः अथवा संहताः समेता बहवोऽतीव क्रोशन्तो
वाच्यमाना दृश्यन्ते। दीप्तायां दिशि तत्कालं रवेर्वशेन या दीप्ता तस्याम्। तदा भयदा
इति। यस्यां रविस्तिष्ठति सा दीप्तेति तल्लक्षणम्।।६५-६६।।
अन्यानप्याह—
श्येनाः प्ररुदन्त इव द्वारे क्रोशन्ति जम्बुका दीप्ताः ।
प्रविशेन्नरेन्द्रभवने कपोतकः कौशिको यदि वा ॥६७॥
यदि श्येन ( बाज ) अधिक रोते हुये की तरह दिखाई दे, सूर्य की तरफ मुख करके
शृगाल ( गीदड़ ) पुरद्वार पर शब्द करे तथा राजभवन में कबूतर या उल्लू प्रवेश करे तो
भय देने वाला होता है। कहीं-कहीं पर 'श्यानः' की जगह 'श्वानः' पाठ मिलता है।।६७।।
श्येनाः प्राचिकाः पक्षिणः प्रकर्षेण रुदन्तो रोदमाना इव भवन्ति तथा जम्बुकाः
शृगाला दीप्ताः सूर्याभिमुखाः क्रूरशब्दाश्च द्वारे पुरद्वारे क्रोशन्ति शब्दं कुर्वते, नरेन्द्रभवने
राजगृहे, कपोतकः पक्षी कौशिक उलूको यदि वा प्रविशेत्। तथा च गर्गः—
श्येनगृध्रबलाकाश्च वामना मुण्डचारिणः।
शब्दायन्त इवात्यर्थं प्रदीप्ताः सङ्घशो यदि।।
रुदन्ति विविधं यत्र तदेवाशु विनश्यति।
यद्यभीक्ष्णं कपोता वा प्रविशन्ति वसन्ति वा।।
राजवेश्मन्युलूका वा तच्छून्यमचिराद् भवेत्।। इति।।६७।।
अथान्यानुत्पातानाह—
कुक्कुटरुतं प्रदोषे हेमन्तादौ च कोकिलालापाः ।
प्रतिलोममण्डलचराः श्येनाद्याश्चाम्बरे भयदाः ॥६८॥
गृहचैत्यतोरणेषु द्वारेषु च पक्षिसङ्गसम्पातः ।
मधुवल्मीकाम्भोरुहसमुद्भवश्चापि नाशाय ॥६९॥
यदि प्रदोष समय में मुर्गा और हेमन्त ऋतु के आदि में कोयल बोलें तथा आकाश
में बाज आदि मांस भक्षण करने वाले पक्षी वृत्ताकार मार्ग में प्रदक्षिण क्रम से चलें तो
भय देने वाले होते हैं। घर, प्रधान वृक्ष, तोरण ( पुरद्वार ) या गृहद्वार पर पक्षियों के
समुदायों का गिरना तथा इन्हीं घर आदि पर मधु ( शहद ) का छत्ता, वल्मीक ( वमई )
और कमलों की उत्पत्ति नाश के लिये होती है।।६८-६९।।
प्रदोषे रात्रिमुखे कुक्कुटरुतं तथा हेमन्तादौ हेमन्तप्रमुखे कोकिलालापाः परभृतां
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