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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

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पृष्ठ 574

५३२ बृहत्संहिता
अखाते प्रदेशे सलिलस्य जलस्योत्पत्तिः सम्भवः । तोयानां जलानां गन्धरसविपर्यये ।
गन्धस्य सौगन्ध्यस्य रसस्य स्वादुताया विपर्यये अन्यत्वे । सलिलाशायानामुदकाधाराणां विकृतौ
विकारे स्वरूपान्यत्वे महदतीव भयं भवति। तत्र चेमां वक्ष्यमाणां शान्तिमाह।।४९।।
तां चाह—
सलिलविकारे कुर्यात् पूजां वरुणस्य वारुणैर्मन्त्रैः ।
तैरेव च जपहोमं शममेवं पापमुपयाति ॥५०॥
जल में विकार होने पर वरुण के मन्त्रों से पूजा, जप और हवन करना चाहिये।
ऐसा करने से भावी अशुभ फल का निवारण हो जाता है॥५०॥
सलिलविकारे जलविकृतौ वरुणस्यापाम्पतेर्वारुणैर्मन्त्रैः पूजामर्चां कुर्यात्, तैरेव
वारुणैर्मन्त्रैर्जपं होमं चाग्नौ कुर्यात्। एवमनेन प्रकारेण पापमनिष्टं शमं शान्तिमुपयाति
प्राप्नोति॥५०॥
इति जलवैकृतम्
•
अथान्यानुत्पातानाह—
प्रसवविकारे स्त्रीणां द्वित्रिचतुष्प्रभृतिसम्प्रसूतौ वा।
हीनातिरिक्तकाले च देशकुलसंक्षयो भवति ॥५१॥
स्त्रियों को किसी प्रकार का प्रसवविकार ( घोड़ा, हाथी, बैल, सर्प आदि जन्तु की
तरह जातक ) होने पर अथवा एक साथ दो, तीन, चार आदि बच्चे होने पर अथवा
प्रसवकाल ( 'तत्कालमिन्दुसहितो द्विरसांशको य' इत्यादि से निर्णीत काल ) से पहले
या बाद में प्रसव होने पर देश और कुल का नाश होता है॥५१॥
स्त्रीणां योषितां प्रसवविकारे प्रसूतिविकृतौ। प्रसवविकारः श्वाद्यङ्गसादृश्यम्। अथवा
द्वित्रिचतुष्प्रभृतिसम्प्रसूतौ। द्वित्रिचतुष्पञ्चषट्सप्ताष्टनवदश वा जायन्ते। हीनातिरिक्तकाले,
हीने अपरिपूर्णे। अतिरिक्ते चाधिके प्रसवे देशसङ्क्षयो देशविनाशः। कुलसंक्षयो वंशवि-
च्छेदश्च भवति॥५१॥
वडवोष्ट्रमहिषगोहस्तिनीषु यमलोद्भवे रणमरणमेषाम्।
षण्मासात् सूतिफलं शान्तौ श्लोकौ च गर्गोक्तौ ॥५२॥
घोड़ी, ऊँटनी, भैंस, गाय और हथिनी को एक साथ दो बच्चे हों तो उन ( घोड़ा
आदि ) का नाश होता है। छः मास बाद प्रसवविकार का फल प्राप्त होता है। इसकी
शान्ति संस्कृत व्याख्या में पठित दो श्लोकों द्वारा करानी चाहिये॥५२॥
वडवा अश्वतरी। उष्ट्रा करभी। महिषी। गौः। हस्तिनी करिणी। एतासु यमलोद्भवे
द्वाभ्यां जनने एषामेवाश्वादीनां मरणं भवति। तथा च गर्गः—
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