बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पाताध्यायः ७२९
शीत और उष्ण में व्यत्यय होने पर अर्थात् गर्मी के समय में ठण्डी और ठण्ड के
समय में गर्मी पड़ने पर तथा जिस ऋतु का जो धर्म है वह ठीक-ठीक नहीं होने से छः
मास बाद राष्ट्र-भय और दैव-जनित (पूर्व-जन्मार्जित पाप के द्वारा) रोग-भय होता है।
ऋतुषु शिशिरादिषु सम्यक् च न प्रवृत्तेषु। गणितदृष्ट्या न प्रवर्तितेषु शीतोष्णविपर्यासो
व्यत्ययः। उष्णकाले शीतत्वं शीतकाले उष्णत्वम्। षण्मासादनन्तरं राष्ट्रभयं भवति।
तथा दैवजनितं प्राक्कर्मार्जितं रोगभयं भवति।।३९।।
अन्यदप्याह—
अन्यर्त्तौ सप्ताहं प्रबन्धवर्षे प्रधाननृपमरणम्।
रक्ते शस्त्रोद्योगो मांसास्थिवसादिभिर्मरकः।।४०।।
धान्यहिरण्यत्वक्फलकुसुमाद्यैर्वर्षितैर्भयं विन्द्यात्।
अङ्गारपांशुवर्षे विनाशमायाति तन्नगरम्।।४१।।
वर्षा से भिन्न ऋतु में लगातार एक सप्ताह तक वृष्टि होने पर प्रधान राजा का मरण,
रक्त की वृष्टि होने पर युद्ध और मांस, हड्डी, वसा आदि (घृत और तेल) की वृष्टि होने पर
मरी (मरकी) पड़ती है। धान्य, सोना, वृक्ष की छाल, फल, पुष्प, आदि (पत्र आदि) की
वृष्टि हो तो भय एवं कोयले और धूली की वृष्टि हो तो नगर का नाश होता है।।४०-४१।।
वर्षाकालं वर्जयित्वा अन्यस्मिन्नृतौ सप्ताहं सप्तदिनानि प्रबन्धवर्षे सततायां वृष्टौ
प्रधानस्य नृपस्य राज्ञो मरणं भवति। रक्तं वृष्टे शस्त्रोद्योगः सङ्ग्रामो भवति। मांसास्थिव-
सादिभिः, मांसमामिषम्, अस्थि प्रसिद्धम्, वसा मज्जा, आदिग्रहणात् घृततैलं गृह्यते। एतै-
र्वृष्टैर्मरको भवति जनानां मरणम्।
धान्यं शालयः। हिरण्यं सुवर्णादि। त्वग्वृक्षसम्भवैव। फलं प्रसिद्धमेव। कुसुमं पुष्पम्।
आदिग्रहणात् पर्णादि। एतैर्वर्षितैर्भयं विन्द्याज्जानीयात्। अङ्गारवर्षे पांशुवर्षे च तन्नगरं
यत्र वर्षति नाशमायाति विनाशं प्राप्नोति।।४०-४१।।
अन्यदप्याह—
उपला विना जलधरैर्विकृता वा प्राणिनो यदा वृष्टाः।
छिद्रं वाप्यतिवृष्टौ सस्यानामीतिसञ्जननम्।।४२।।
यदि मेघ के बिना ओलों की वृष्टि, विकारयुत प्राणियों की वृष्टि या अतिवृष्टि होने पर
भी कहीं-कहीं पर छिद्र (अवृष्टि) हो तो धान्यों को ईति (अतिवृष्टि आदि) का भय
होता है।।४२।।
विना जलदैर्मेघैरुपलाः पाषाणा वृष्टाः। अथवा विकृताः सविकाराः प्राणिनः खरोष्ट्रा-
ऽश्वमार्जारशृगालप्रभृतयो वृष्टाः। अतिवृष्टौ वापि छिद्रं मध्ये कुत्रचिदवृष्टिरित्यर्थः। तच्च
सस्यानामीतिसञ्जननमुपद्रवोत्पादकम्।।४२।।
बृ० सं० प्र०-३४
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