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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 568

५२६ बृहत्संहिता
सूखे हुये वृक्षों में विरोह (पुनः अङ्कुर) होने से बल और अन्न का नाश तथा गिरे
हुये वृक्षों के अपने-आप उठने से दैवजनित भय होता है।।२८।।
शुष्कविरोहे शुष्काणां नीरसानां वृक्षाणां विरोहे वीर्यान्नसंक्षय एव। पतितानां वृक्षाणां
स्वयमात्मनैवोत्थाने ऊर्ध्वस्थितौ दैवजनितं दैवोत्पन्नं भयं भवति। चशब्दः समुच्चये।
अन्यदप्याह—
पूजितवृक्षे ह्यनृतौ कुसुमफलं नृपवधाय निर्दिष्टम् ।
धूमस्तस्मिन् ज्वालाऽथवा भवेन्नृपवधायैव ॥२९॥
प्रधान वृक्ष में पुष्प और फलों की उत्पत्ति राजा के नाश के लिए और उस (प्रधान
वृक्ष) पर धूप या अग्नि की ज्वाला भी राजा के नाश के लिये ही होती है।।२९।।
पूजितवृक्षे प्रधानतरौ अनृतौ कुसुमफलं कुसुमानां फलानां चोद्गमो नृपस्य राज्ञो
वधाय नाशाय निर्दिष्टं कथितम्। अथवा तस्मिन् वृक्षे धूमो ज्वाला अथवा भवेत्तदा नृपवधा-
यैव राजमृत्यवे भवति।।२९।।
अन्यदप्याह—
सर्पत्सु तरुषु जल्पत्सु वापि जनसंक्षयो विनिर्दिष्टः ।
वृक्षाणां वैकृत्ये दशाभिर्मासैः फलविपाकः ।।३०।।
वृक्षों के चलने या उनसे किसी प्रकार के शब्द निकलने पर मनुष्यों का नाश होता
है। सभी वृक्षों के विकारजन्य फल दश मास में घटित होते हैं।।३०।।
तरुषु वृक्षेषु सर्पत्सु गच्छत्सु जल्पत्सु व्याहरत्सु वा जनानां लोकानां क्षयो विनाशो
विनिर्दिष्टः कथितः। वृक्षाणां सर्वेषां वैकृत्ये विकारे दशाभिर्मासैर्गतैः फलस्य विपाको
भवति।।३०।।
अत्र शान्तिमाह—
स्रग्गन्धधूपाम्बरपूजितस्य छत्रं विधायोपरि पादपस्य ।
कृत्वा शिवं रुद्रजपोऽत्र कार्यो रुद्रेभ्य इत्यत्र षडेव होमाः ॥३१॥
पायसेन मधुनापि भोजयेद् ब्राह्मणान् घृतयुतेन भूपतिः ।
मेदिनी निगदितात्र दक्षिणा वैकृते तरुकृते हितार्थिभिः ॥३२॥
इस उत्पात में सुगन्ध द्रव्य, धूप और वस्त्रों से पूजित विकारयुत वृक्ष के ऊपर छत्र
रखकर एकादश रुद्रों के मन्त्रों का जप करे। 'रुद्रेभ्यः स्वाहा' इस मन्त्र से केवल छः बार
हवन करे, घृतयुत पायस से ब्राह्मणों को भोजन करावे; साथ ही इस वृक्षविकारजन्य उत्पात
में प्राणियों के हितचिन्तक मुनियों ने दक्षिणा में पृथ्वी देने को कहा है।।३१-३२।।
पादपस्य वृक्षस्य स्रग्भिर्मालाभिः। गन्धैः सुगन्धद्रव्यैः। धूपैर्गुग्गुलप्रभृतिभिः। अम्बरै-
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