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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 567

उत्पादताध्यायः ५२५
अथान्यानुत्पातानाह—
शाखाभङ्गेऽकस्माद्वृक्षाणां निर्दिशेद्रणोद्योगम्।
हसने देशभ्रंशं रुदिते च व्याधिबाहुल्यम्॥२५॥
अचानक वृक्ष की शाखा टूट जाने से युद्ध की तैयारियाँ, वृक्षों के हँसने से देश का
नाश और वृक्षों के रोने से व्याधि की अधिकता होती है॥२५॥
अकस्माद्वृक्षाणां शाखाभङ्गे शाखास्फोटने रणोद्योगं सङ्ग्रामविभ्रमं निर्दिशेद्वदेत्।
तथा वृक्षाणामेव हसने देशभ्रंशं देशविनाशम्। रुदिते च रोदने वृक्षाणामेव व्याधिबाहुल्यं
रोगप्राचुर्यम्॥२५॥
अथान्यदप्याह—
राष्ट्रविभेदस्त्वनृतौ बालवधोऽतीव कुसुमिते बाले।
वृक्षात् क्षीरस्रावे सर्वद्रव्यक्षयो भवति॥२६॥
ऋतुवर्जित काल में वृक्षों में पुष्प और फलों की उत्पत्ति होने से राज्य में विभेद,
छोटे वृक्ष में बहुत पुष्प आने से बालकों का नाश और वृक्षों से दूध निकलने पर द्रव्यों
का नाश होता है॥२६॥
वृक्षाणामनृतावृतुवर्जिते काले पुष्पफलोद्गमे सम्भवे राष्ट्रस्य विभेदो भवति। बाले
बालवृक्षे अतीव कुसुमिते सजातपुष्पे बालानां शिशूनां वधो मरणम्। तथा च गर्गः—
स्वराष्ट्रभेदं कुरुते फलपुष्पमनार्तवम्।
बालानां मरणं कुर्याद्द्वालानां फलपुष्पजम्॥ इति।
तथा वृक्षात् द्रुमात्क्षीरस्रावे दुग्धे स्रुते सर्वद्रव्याणां क्षयो विनाशो भवति॥२६॥
अन्यदप्याह—
मद्ये वाहननाशः संग्रामः शोणिते मधुनि रोगः।
स्नेहे दुर्भिक्षभयं महद्भयं निःस्रुते सलिले॥२७॥
वृक्ष से मद्य निकलने पर वाहनों ( अश्वादिकों ) का नाश, रक्त निकलने पर युद्ध,
शहद निकलने पर रोग, तेल निकलने पर दुर्भिक्ष का भय और वृक्ष से जल निकलने पर
अधिक भय होता है॥२७॥
वृक्षान्मद्ये निःस्रुते निर्गते वाहनानामश्वादीनां नाशः क्षयः। शोणिते रक्ते निःस्रुते
संग्रामो युद्धं भवति। मधुनि माक्षिके निःस्रुते रोगो भवति। स्नेहे तैलादिके निःस्रुते दुर्भिक्ष-
भयं भवति। सलिले जले निःस्रुते महदतुलं भयं भवति॥२७॥
अन्यदप्याह—
शुष्कविरोहे वीर्यग्निसंक्षयः शोषणे च विरुजानाम्।
पतितानामुत्थाने स्वयं भयं दैवजनितं च॥२८॥
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