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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 556

५१४ बृहत्संहिता
सम्मुख में होकर घर में प्रवेश करता हुआ दिखाई दे तो धन करने वाला और आकाश
में उड़ता हुआ दिखाई दे तो बन्धु-समागम होता है।।१३।।
खगः पक्षी खञ्जनको मृतविकलविभिन्नरोगितः स्वतनुसमानमात्मीयशरीरतुल्यं फलं
ददाति। तद्यथा—मृतो यदि दृश्यते तदा द्रष्टुर्मरणमेव ददाति। एवं विकलोऽङ्गवैकल्यम्।
विभिन्नशरीरो भेदनम्। रोगितः सञ्जातरोगो रोगमेव ददाति। धनकृदभिनिलीयमानक
इति। अभिमुख्येन निलीयमान आलयं प्रविशन् धनकृत् धनसंश्लेषं कुरुते। वियत्याकाशे
उड्डीनमाने बन्धुसमागमप्रदो बन्धुभिः सह संयोगं ददाति।।१३।।
अथ खञ्जनदृष्टे विधानमाह—
नृपतिरपि शुभं शुभप्रदेशे खगमवलोक्य महीतले विदध्यात्।
सुरभिकुसुमधूपयुक्तमर्घं शुभमभिनन्दितमेवमेति वृद्धिम् ॥१४॥
राजा शुभ प्रदेश में शुभ लक्षणयुत खञ्जन पक्षी को भी देखकर सुगन्धयुत पुष्प
और धूपयुत अर्घ देवे। इस तरह करने से सम्मानित शुभ फल की वृद्धि होती है।।१४।।
नृपती राजा शुभे प्रदेशे शुभं प्रशस्तलक्षणमपि खगं पक्षिणमवलोक्य दृष्ट्वा महीतले
भूपृष्ठे सुरभिकुसुमधूपयुक्तमर्घम्, सुरभीणि सुगन्धीनि यानि कुसुमानि पुष्पाणि तथा सुगन्धा
ये धूपास्तैः संयुक्तमर्घं विदध्याद् दापयेत्। एवमनेन प्रकारेण शुभं फलमभिनन्दितं सम्मानितं
वृद्धिमेति वृद्धिं गच्छति।।१४।।
अथाशुभे खञ्जनके दृष्टे विधानमाह—
अशुभमपि विलोक्य खञ्जनं द्विजगुरुसाधुसुरार्चने रतः।
न नृपतिरशुभं समाप्नुयान्न यदि दिनानि च सप्त मांसभुक् ॥१५॥
अशुभ फल देने वाले खञ्जन को देख कर भी राजा यदि ब्राह्मण, गुरु, सज्जन और
देवताओं के पूजन में निरत हो जाय एवं सात दिन तक यदि मांस-भक्षण न करे तो उसे
किसी प्रकार का अशुभ फल प्राप्त नहीं होता।।१५।।
नृपती राजा अशुभमपि अनिष्टफलमपि खञ्जनं विलोक्य दृष्ट्वा यदि द्विजानां ब्राह्मणा-
नाम्, गुरूणामुपदेशकर्तॄणाम्, साधूनां सज्जनानाम्, सुराणां देवानाम्, अर्चने रतः सक्तो
भवति, तदा नाशुभमनिष्टफलं समाप्नुयात् प्राप्नोति। यदि सप्त दिनानि सप्ताहं मांस-
भुग् न भवति। मांसं यदि न भुङ्क्ते नाश्नाति।।१५।।
तथा कालप्रदर्शनार्थमाह—
आवर्षात् प्रथमे दर्शने फलं प्रतिदिनं तु दिनशेषात्।
दिक्स्थानमूर्तिलग्नर्क्षशान्तदीप्तादिभिश्चोह्यम् ॥१६॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां खञ्जनकलक्षणाध्यायः पञ्चचत्वारिंशः ॥४५॥