बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१२ बृहत्संहिता
गृहपटलेऽर्थभ्रंशो बघ्रे बन्धोऽशुचौ भवति रोगः ।
पृष्ठे त्वजाविकानां प्रियसङ्गममावहत्याशु ॥८॥
यदि कीचड़ में बैठा हुआ खञ्जन दिखाई दे तो स्वादिष्ट भोजन मिलता है। गोबर
पर दिखाई दे तो दूध, दही, घृत काफी मिलता है। दूब पर दिखाई दे तो वस्त्रलाभ होता
है और गाड़ी पर दिखाई दे तो देश का नाश होता है। घर की छत पर खञ्जन दिखाई दे
तो धन का नाश, चमड़े की बनी हुई छेद वाली वस्तु पर दिखाई दे तो बन्धन, अपवित्र
स्थान पर दिखाई दे तो रोग, छाग या भेड़ के ऊपर दिखाई दे तो बहुत जल्दी
मित्रसमागम होता है॥७-८॥
पङ्कः कर्दमस्तत्र संस्थे खञ्जनके स्वाद्वन्नप्राप्तिः सृष्टभोजनलाभः। तथा गोमयोपगते
गोमयनिचयस्थे गोरससम्पन्मथितबाहुल्यम्। शाद्वलगे दूर्वास्थे वस्त्राप्तिरम्बरलाभः। शकटस्थे
शकटारूढे देशस्य विभ्रंशो नाशः।
गृहपटले गृहच्छादने अर्थस्य वित्तस्य भ्रंशो नाशः। बघ्रे चर्ममये बन्धो बन्धनम्।
अशुचावशुद्धे स्थाने रोगो भवति। अजश्छागः। अविः प्रसिद्धः। अजाविकानां पृष्ठे उपरि
स्थिते आशु क्षिप्रमेव प्रियसङ्गमं वल्लभसमायोगमावहति करोति॥७-८॥
अन्यदप्याह—
महिषोष्ट्रगर्दभास्थिश्मशानगृहकोणशर्कराट्टस्थः ।
प्राकारभस्मकेशेषु चाशुभो मरणरुग्भयदः ॥९॥
भैंस, ऊँट, गदहा, श्मशान, घर का कोना, मिट्टी का ढेला, अटारी, घेरे की दीवाल,
भस्म और केश पर यदि खञ्जन दिखाई दे तो मरण और रोगभयरूप अशुभ फल होता है।
एतेषु स्थानेषु खञ्जनको दृष्टः स चाशुभः प्रागलक्षणो न भवति तदा मरणरुग्भयदः।
द्रष्टुर्मरणं मृत्युं रुग्भयं च ददाति। केषु स्थानेषु? महिषे। उष्ट्रे करभे। गर्दभे खरे। अस्थि-
श्मशाने पितृवने। गृहकोणे वेश्माग्रे। शर्करे मृत्खण्डे। अट्टे अट्टालके। प्राकारभित्तौ।
भस्मनि। केशेषु। एतेषु स्थानेषु॥९॥
अन्यदपि लक्षणमाह—
पक्षौ धुन्वन्नशुभः शुभः पिबन् वारि निम्नगासंस्थः ।
सूर्योदये प्रशस्तो नेष्टफलः खञ्जनोऽस्तमये ॥१०॥
दोनों पंखों को हिलाता हुआ खञ्जन दिखाई दे तो शुभ नहीं है। नदी में (कोई-कोई
‘वारिवाहस्थः = पानी जाने वाले प्रदेश में' ऐसा पाठ मानते हैं) पानी पीता हुआ दिखाई
दे तो शुभ होता है। यदि सूर्योदय काल में खञ्जन दिखाई दे तो शुभ और अस्त काल
में दिखाई दे तो अशुभ फल देने वाला होता है॥१०॥
पक्षावङ्गरूहौ धुन्वन् कम्पयन्नशुभोऽनिष्टफलदः। निम्नगा नदी तत्रस्थो वारि जलं
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