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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 728 में से

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पृष्ठ 515

अर्घकाण्डाध्यायः ४७३
अथ कन्यागते रवावाह—
कन्यागते दिनकरे चामरखरकरभवाजिनां क्रेता।
षष्ठे मासे द्विगुणं लाभमवाप्नोति विक्रीणन् ॥७॥
कन्या राशिगत सूर्य के समय पूर्वोक्त उत्पातों को देख कर चामर, गदहा, ऊँट और
घोड़ों का संग्रह करके छठे मास में विक्रय करने से दूना लाभ होता है।।७।।
दिनकरे सूर्ये कन्यागते प्रागुक्तानुत्पातान् दृष्ट्वा चामरं बालव्यजनम्। खरो गर्दभः।
करभ उष्ट्रः। वाजी तरगः। एषां क्रेता षष्ठे मासे विक्रीणन् विक्रेता द्विगुणं लाभमाप्नोति
लभते ।।७।।
अथ तुलागत आह—
तौलिनि तान्तवभाण्डं मणिकम्बलकाचपीतकुसुमानि।
आदद्याद्धान्यानि च वर्षार्द्धाद् द्विगुणिता वृद्धिः ॥८॥
तुला राशिगत सूर्य के समय पूर्वोक्त उत्पातों को देखकर सूती तथा ऊनी वस्त्र, वर्तन,
मणि, कम्बल, काँच, पीले वस्त्र, पुष्प और धान्यों का संग्रह करके छठे मास में विक्रय
करने से दूना लाभ होता है।।८।।
तौलिनि तुलागतेऽर्के तान्तवभाण्डं तन्तुकृतं यत्किञ्चित् कर्म कर्पटादि मणयः।
कम्बलम्। काचम्। पीतानि पीतवर्णानि कुसुमानि पुष्पाणि। एतान्यादद्याद्ग्राहयेत्। धान्यानि
च तथा। वर्षार्द्धात् षड्भिर्मासैर्द्विगुणिता वृद्धिर्द्विगुणत्वं व्रजन्ति। द्विगुणलाभो भवतीत्यर्थः।
अथ वृश्चिकस्थ आह—
वृश्चिकसंस्थे सवितरि फलकन्दकमूलविविधरत्नानि।
वर्षद्वयमुषितानि द्विगुणं लाभं प्रयच्छन्ति ॥९॥
वृश्चिक राशिगत सूर्य के समय पूर्वोक्त उत्पात होने पर फल, कन्द, मूल और अनेक
प्रकार के रत्नों का संग्रह करके दो वर्ष बाद विक्रय करने से दूना लाभ होता है।।९।।
सवितरि आदित्ये वृश्चिकसंस्थे। फलानि। कन्दको मूलविशेषः। मूलानि अन्यानि
द्रव्याणि। विविधानि नानाकाराणि रत्नानि। एतानि वर्षद्वयमुषितानि द्विगुणं लाभं प्रयच्छन्ति
ददति।।९।।
अथ धन्विस्थ आह—
चापगते गृह्णीयात् कुङ्कुमशङ्खप्रवालकाचानि।
मुक्ताफलानि च ततो वर्षार्द्धात् द्विगुणतां यान्ति ॥१०॥
धनु राशिगत सूर्य के समय में पूर्वोक्त उत्पात होने पर कुंकुम, शङ्ख, मूँगा, काँच और
मोतियों का संग्रह करके छः मास बाद विक्रय करने से दूना लाभ होता है।।१०।।
चापगते धन्विस्थेऽर्के गृह्णीयात्। कुङ्कुमं काश्मीरम्। शङ्खम्। प्रवालं विद्रुमम्। काचम्।
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