बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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वृष राशि में स्थित सूर्य के समय में उसमें होने वाले मूल और फलों का संग्रह करे, उन
( मेष और वृष ) से चतुर्थ मास में उसको विक्रय करने से लाभ होता है।।३।।
सूर्ये रवौ मेषोपगते मेषं प्राप्ते। अमावास्यायां पौर्णमास्यां चोत्पातानुक्तान् दृष्ट्वा ग्रीष्म-
जस्य ग्रीष्मोत्पन्नस्य धान्यस्य संग्रहं कृत्वा तथा वृषे वृषगतेऽर्के वनमूलफलस्य वन्यानां
मूलफलानां संग्रहं कृत्वा तयोर्मेषवृषयोश्चतुर्थे मासि विक्रयाल्लाभो भवति।।३।।
अथ मिथुनस्थ आह—
मिथुनस्थे सर्वरसान् धान्यानि च संग्रहं समुपनीय।
षष्ठे मासे विपुलं विक्रेता प्राप्नुयाल्लाभम् ॥४॥
मिथुन राशिगत सूर्य के समय में मधुर आदि सभी रसों का संग्रह करके उससे छठे
मास में विक्रय करने से बहुत लाभ होता है।।४।।
मिथुनस्थेऽर्के प्रागुक्तानुत्पातान् दृष्ट्वा। सर्वरसान् मधुरादीन्। धान्यानि च शालीन्।
संग्रहं समुपनीय। संग्रहमेषां कृत्वा विक्रेता षष्ठे मासे विपुलं विस्तीर्णं लाभं प्राप्नुयाल्लभेत।
अथ कर्कटस्थ आह—
कर्किण्यर्के मधुगन्धतैलघृतफाणितानि विनिधाय।
द्विगुणा द्वितीयमासे लब्धिर्हीनाधिके छेदः ॥५॥
कर्क राशिगत सूर्य के समय में मधु, सुगन्ध, द्रव्य, तेल, घी और शक्कर का संग्रह
करके दूसरे मास में विक्रय करने से दूना लाभ होता है। दो महीने से कम या अधिक में
विक्रय करने से नाश होता है।।५।।
अर्के आदित्ये कर्किणि कर्कटस्थे मधु माक्षिकम्। गन्धः सुगन्धद्रव्याणि। तैलम्।
घृतमाज्यम्। फाणितमिक्षुरसक्वाथः क्षुद्रगुडादि। एतानि विनिधाय संस्थाप्य द्वितीयमासे
विक्रयाद् द्विगुणा लब्धिर्भवति। हीने कालेऽधिके वा विक्रयाच्छेदो भवति।।५।।
अथ सिंहस्थ आह—
सिंहे सुवर्णमणिचर्मवर्मशस्त्राणि मौक्तिकं रजतम्।
पञ्चममासे लब्धिर्विक्रेतुरतोऽन्यथा छेदः ॥६॥
सिंह राशिगत सूर्य के समय में सोना, मणि, चमड़ा, शस्त्र, मोती और चाँदी का
संग्रह करके पाँचवें मास में विक्रय करने से लाभ होता है। न्यूनाधिक काल में विक्रय
करने से हानि होती है।।६।।
सिंहस्थेऽर्के सुवर्णम्। मणयः। चर्माणि। वर्म सन्नाहः। शस्त्राण्यायुधानि। मौक्तिकं
मुक्ताफलानि। रजतं रौप्यम्। एतानि विनिधाय विक्रेतुः पञ्चमे मासे विक्रयाल्लब्धिर्भवति।
अतोऽन्यथा ऊने कालेऽधिके वा छेदो भवति।।६।।
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