बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसस्यजातकाध्यायः ४६३
सूर्यात् सप्तमसंस्थः पापोऽयः केन्द्रगश्च हानिकरौ।
सौम्यग्रहसन्दृष्टौ न तथा सर्वत्र निर्दिष्टौ।। इति।।१०।।
अन्यद्योगान्तरमाह—
वृश्चिकसंस्थादर्कात् सप्तमषष्ठोपगौ यदा क्रूरौ।
भवति तदा निष्पत्तिः सस्यानामर्घपरिहानिः ॥११॥
वृश्चिक-स्थित सूर्य से सप्तम और षष्ठ स्थान में दो पापग्रह मङ्गल और शनि बैठे हों
तो धान्यों की निष्पत्ति होती है; किन्तु धान्यों का मौल्य महँगा पड़ता है।।११।।
अर्कादादित्याद्वृश्चिकसंस्थात् क्रूरौ पापौ भौमसौरौ यदा सप्तमषष्ठोपगौ। एकः सप्तमे
परः षष्ठे भवति, तदा सस्यानां निष्पत्तिर्भवति। किन्त्वर्घस्य परिहानिः स्वल्पता। बहु-
मूल्येनाल्पं लभत इत्यर्थः।।११।।
अथ शारदसस्यानामतिदेशार्थमाह—
विधिनानेनैव रविर्वृषप्रवेशे शरत्समुत्थानाम्।
विज्ञेयः सस्यानां नाशाय शिवाय वा तज्ज्ञैः ॥१२॥
पूर्व-स्थिति की तरह वृष राशिगत सूर्य के समय शारदीय धान्यों का नाश या निष्पत्ति
पण्डितों को जानना चाहिये।।१२।।
अनेनैव निर्दिष्टेन विधिना वृश्चिकप्रवेशोक्तेन रविरादित्यो वृषप्रवेशे वृषसंक्रमणकाले
शरत्समुत्थानां शरत्समुद्भूतानां सस्यानां नाशायाभावाय शिवाय निष्पत्तये वा तज्ज्ञैः
पण्डितैः सस्यजातकज्ञैर्विज्ञेयो ज्ञातव्यः। तथा च बादरायणः—
य एव योगोऽभिहितो वृश्चिकस्थे दिवाकरे।
वृषेऽपि ते शारदानां चिन्तनीया यथार्थतः।। इति।।१२।।
अधुना रविचारवशेन ग्रैष्मिकसस्यस्य सामर्घ्यं महर्घतां चाह—
त्रिषु मेषादिषु सूर्यः सौम्ययुतो वीक्षितोऽपि वा विचरन्।
ग्रैष्मिकधान्यं कुरुते समर्घमभयोपयोगयं च ॥१३॥
मेष आदि तीन राशियों (मेष, वृष, मिथुन) में गमन करता हुआ सूर्य यदि शुभग्रह
से युत या दृष्ट हो तो ग्रीष्म में होने वाले धान्य सस्ते होते हैं तथा लोक-परलोक दोनों के
लिये उपयुक्त होते हैं; जैसे कि बहुत सस्ते धान्य होने के कारण बन्धुवर्गों के साथ खूब
उपभोग करने से लोक और दानादि धर्मकार्य करने से परलोक—दोनों बन जाते हैं। कहीं-
कहीं पर ‘अभयोपयोगयम्’ ऐसा पाठ मिलता है; जिसका अर्थ यह है कि ये अभीतिकारक
होते हैं अर्थात् ऐसे समय में निर्भय मनुष्य रहते हैं।।१३।।
सूर्य आदित्यः। त्रिषु मेषादिषु मेषवृषमिथुनेषु सौम्यैः शुभग्रहैर्बुधगुरुशुक्रैर्युतः संयुक्तो
वीक्षितोऽवलोकितो वा विचरंस्तिष्ठन् ग्रैष्मिकं ग्रीष्मसम्भवं धान्यं समर्घं स्वल्पमूल्यं कुरुते।
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