बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 503, कुल 728 में से
संदर्भ में पढ़ेंसस्यजातकाध्यायः ४६१
दो शुभ ग्रहों के मध्य में स्थित होकर सूर्य वृश्चिक राशि में स्थित हो और सूर्य से
सप्तम में गुरु और चन्द्रमा हो तो धान्यों की उत्तम निष्पत्ति होती है तथा वृश्चिक के आदि
में सूर्य और उससे द्वितीय में गुरु हो तो धान्यों की आधी निष्पत्ति होती है।।५।।
अलिनि वृश्चिके शुभमध्यस्थिते वृश्चिकात् सूर्ययुक्ताद् बुधशुक्रयोरेको द्वितीयस्थाने
भवति, अन्यो द्वादशे। वा शुभमध्यगतो भवति। तथाभूतात् सूर्यादादित्याद् गुरुशशिनो-
र्बृहस्पतिचन्द्रयोः सप्तमस्थाने स्थितयोः परा प्रकृष्टा सम्पत् सस्यानां भवति। अल्यादिस्थ
इति। अलिनि आदौ तिष्ठति अल्यादिस्थस्तस्मिन् सवितर्यादित्ये अल्यादिस्थे वृश्चिक-
प्रारम्भव्यवस्थिते गुरौ जीवे द्वितीयेऽर्द्धनिष्पत्तिः सस्यानां भवति। अर्द्धं निष्पद्यत इत्यर्थः।
अन्यद्योगान्तरमाह—
लाभहिबुकार्थयुक्तैः सूर्यादलिगात् सितेन्दुशशिपुत्रैः।
सस्यस्य परा सम्पत् कर्मणि जीवे गवां चाग्र्या ॥६॥
यदि वृश्चिक राशि में स्थित सूर्य से एकादश में शुक्र, चतुर्थ में चन्द्र और द्वितीय में
बुध स्थित हो तो धान्यों की उत्तम निष्पत्ति होती है। यदि पूर्वोक्त योग में दशम स्थित गुरु
हो तो गायों में उत्तम सम्पत्ति ( दूध की अधिकता ) होती है।।६।।
सूर्यादादित्यादलिगाद् वृश्चिकस्थात् सितेन्दुशशिपुत्रैः शुक्रचन्द्रबुधैर्यथासङ्ख्यं लाभ-
हिबुकार्थयुक्तैः। एकादशचतुर्थद्वितीयस्थैः। तत्रैतज्जातम्। एकादशगे शुक्रे चतुर्थे चन्द्रे
द्वितीये बुधे सस्यस्य परा प्रकृष्टा सम्पद् भवति। अस्मन्नेव योगे कर्मणि दशमस्थाने स्थिते
जीवे गुरौ न केवलं सस्यस्य परा सम्पद् भवति, यावद् गवां चाग्र्य श्रेष्ठा सम्पद् भवति।
क्षीरबाहुल्यमित्यर्थः ।।६।।
अन्यद्योगान्तरमाह—
कुम्भे गुरुर्गवि शशी सूर्योऽलिमुखे कुजार्कजौ मकरे।
निष्पत्तिरस्ति महती पश्चात् परचक्रभयरोगम् ॥७॥
यदि कुम्भ में गुरु, वृष में चन्द्रमा, वृश्चिक के आदि में सूर्य तथा मकर में मङ्गल
और शनि स्थित हो तो धान्यों की अधिक निष्पत्ति होती है; किन्तु बाद में परचक्र का
आगमन और रोग का भय होता है।।७।।
रविवृश्चिकप्रवेशे कुम्भे गुरुर्जीवः स्थितो भवति। गवि वृषे शशी चन्द्रः। सूर्योऽर्कः।
अलिमुखे वृश्चिकप्रारम्भे। कुजार्कजौ भौमसौरौ मकरे। एवंविधे योगे सस्यानां महती
निष्पत्तिरस्ति विद्यते, किन्तु पश्चादनन्तरं परचक्रकृतं भयं रोगं च भवति।।७।।
अन्यद्योगान्तरमाह—
मध्ये पापग्रहयोः सूर्यः सस्यं विनाशयत्यलिगः।
पापः सप्तमराशौ जातं जातं विनाशयति ॥८॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA