सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 728 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 502

४६० बृहत्संहिता
इत्यस्माद्विकल्पादिदमवगम्यते यदा सौम्यैर्बलिभिरबलिभिर्वा केन्द्रस्थानानि युक्तानि भवन्ति
तदा ग्रैष्मिकसस्यविवृद्धिर्भवति। यदा तु पुनस्त्रिकोणरिपुलाभागाः सौम्या बलिनः पश्यन्ति
तदा ग्रैष्मिकस्य विवृद्धिर्भवति। मध्यबलैर्याप्यता। बलहीनैर्मनागपि सस्यानां वृद्धिर्भवति।
तथा च बादरायणः—
वृश्चिकसंस्थे सूर्ये सौम्यैर्बलिभिर्निरीक्षिते वृद्धिम्।
तैरेव केन्द्रगैर्वा ग्रीष्मजधान्यस्य निर्दिशेन्महतीम्॥ इति॥२॥
अथ योगान्तरमाह—
अष्टमराशिगतेऽर्के गुरुशशिनोः कुम्भसिंहसंस्थितयोः।
सिंहघटसंस्थयोर्वा निष्पत्तिर्ग्रीष्मसस्यस्य ॥३॥
सूर्य के आठवीं राशि (वृश्चिक) में गत होने के समय कुम्भ राशि में गुरु और सिंह
राशि में चन्द्रमा या सिंह राशि में गुरु और कुम्भ राशि में चन्द्रमा स्थित हो तो ग्रीष्म ऋतु
में होने वाले धान्यों की निष्पत्ति (वृद्धि) होती है॥३॥
अर्के रवावष्टमराशिगते वृश्चिकस्थे इत्यर्थः। गुरुशशिनोर्जीवचन्द्रयोर्यथाक्रमं कुम्भ-
सिंहसंस्थयोः। कुम्भे गुरुः शशी सिंहे। अथवा सिंहघटसंस्थयोः। गुरुः सिंहे शशी घटे।
तथापि ग्रीष्मसस्यस्य निष्पत्तिर्वक्तव्येति॥३॥
अथ योगान्तरमाह—
अर्कात् सिते द्वितीये बुधेऽथवा युगपदेव वा स्थितयोः।
व्ययगतयोरपि तद्वन्निष्पत्तिरतीव गुरुदृष्ट्या ॥४॥
यदि सूर्य से द्वितीय या द्वादश में शुक्र या बुध या दोनों एक साथ स्थित हों तो ग्रीष्म
ऋतु में होने वाले धान्यों की निष्पत्ति होती है। यदि पूर्वोक्त योगों में बृहस्पति की दृष्टि हो
तो ग्रीष्म ऋतु में होने वाले धान्यों की उत्तम निष्पत्ति होती है॥४॥
अर्काद्रवेरलिस्थितात् सिते शुक्रे द्वितीये द्वितीयस्थानस्थे बुधेऽथवा द्वितीये। अथवा
तयोर्बुधसितयोर्द्वयोरेव युगपद् द्वितीयस्थयोः। व्ययगतयोरपि। तद्वत्तेनैव प्रकारेण व्ययगत-
योरादित्याद् द्वादशस्थाने स्थितयोः शुक्रे द्वादशगे बुधे वा द्वयोर्वा द्वादशस्थानस्थितयोः
सस्यानां निष्पत्तिर्भवति। अतीव गुरुदृष्ट्या। बृहस्पतिर्यदाऽऽदित्यं पश्यति तदा अतीव
सस्यानां निष्पत्तिर्भवति। तथा च बादरायणः—
सूर्याद् बुधे द्वितीये शुक्रे वा युगपदेव तयोः।
रिष्फगयोर्प्येवं निष्पत्तिर्गुरुदृशाऽतीव॥ इति॥४॥
अन्यद्योगान्तरमाह—
शुभमध्येऽलिनि सूर्याद् गुरुशशिनोः सप्तमे परा सम्पत्।
अल्यादिस्थे सवितरि गुरौ द्वितीयेऽर्द्धनिष्पत्तिः ॥५॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA