बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ रजोलक्षणाध्यायः १
कथयन्ति पार्थिववधं रजसा घनतिमिरसञ्चयनिभेन।
अविभाव्यमानगिरिपुरतरवः सर्वा दिशश्छन्नाः ॥१॥
जब घने अन्धकार की तरह धूलि से पर्वत, पुर, वृक्ष और सब दिशायें व्याप्त हो जाने
से कुछ भी नहीं दिखाई देता हो, तो उस समय राजा का नाश कहना चाहिये ।।१।।
यस्यां दिशि धूपचयः प्राक्प्रभवति नाशमेति वा यस्याम्।
आगच्छति सप्ताहात्तत्रैव भयं न सन्देहः ॥२॥
पहले जिस दिशा में धूलि की उत्पत्ति हो और जिस दिशा में नाश हो, उन दोनों
दिशाओं में सात दिन के अन्दर निःसन्देह भय होता है ।।२।।
श्वेते रजोघनौघे पीडा स्यान्मन्त्रिजनपदानां च।
न चिरात्प्रकोपमुपयाति शस्त्रमतिसङ्कुला सिद्धिः ॥३॥
सघन धूलि का समूह यदि श्वेत वर्ण का हो तो मन्त्री तथा राष्ट्र को पीड़ा, शीघ्र शस्त्र
का प्रकोप और अत्यन्त कठिनता से कार्य की सिद्धि होती है ।।३।।
अर्कोदये विजृम्भति यदि दिनमेकं दिनद्वयं वाऽपि।
स्थगयन्निव गगनतलं भयमत्युग्रं निवेदयति ॥४॥
यदि सूर्यास्त के समय उत्पन्न होकर धूलि एक या दो दिन तक आकाश को ढकी हुई
रहे तो वह आने वाले उग्र भय को अभिव्यक्त करती है ।।४।।
अनवरतसञ्चयवहं रजनीमेकां प्रधाननृपहन्तृ।
क्षेमाय च शेषाणां विचक्षणानां नरेन्द्राणाम् ॥५॥
यदि बराबर इकट्ठी होकर धूलि एक रात्रि तक स्थित रहे तो प्रधान राजा की मृत्यु और
शेष बुद्धिमान् राजाओं को शुभ करती है ।।५।।
रजनीद्वयं विसर्पति तस्मिन् राष्ट्रे रजोघनं बहुलम्।
परचक्रस्यागमनं तस्मिन्नपि सन्निबोद्धव्यम् ॥६॥
जिस देश में दो रात्रि तक बराबर घनीभूत धूलि फैलती है, उस देश में निश्चय ही
किसी दूसरे राजा का आगमन कहना चाहिये ।।६।।
१. भट्टोत्पलकृतविवृतावस्याध्यायस्योल्लेख एव नास्ति; अतोऽयं प्रतिभाति यदयमध्याय
एव केनचित्प्रक्षिप्त इति।
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