बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरजोलक्षणाध्यायः ४५५
निपतति रजनीत्रितयं चतुष्कमप्यन्नरसविनाशाय ।
राज्ञां सैन्यक्षोभो रजसि भवेत् पञ्चरात्रभवे ॥७॥
यदि तीन या चार रात्रि तक बराबर धूलि गिरती रहे तो अन्न और रस के विनाश के
लिये होती है। यदि पाँच रात्रि तक लगातार धूलि का वर्षण हो तो राजाओं की सेनाओं
में खलबली मचती है।।७।।
केत्वाद्युदयविमुक्तं यदा रजो भवति तीव्रभयदायि।
शिशिरादन्यत्रर्तौ फलमविकलमाहुराचार्याः ॥८॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां रजो-
लक्षणाध्यायोऽष्टत्रिंशः ॥३८॥
यदि केतु आदि के उदय के बाद धूलि गिरे तो तीव्र भय देने वाली होती है। आचार्यों
का मत है कि शिशिर ऋतु के अतिरिक्त अन्य समस्त ऋतुओं में ठीक-ठीक फल देती
है।।८।।
इति 'विमला'हिन्दीटीकायां रजोलक्षणाध्यायोऽष्टत्रिंशः ॥३८॥
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