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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 728 में से

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पृष्ठ 494

अथ प्रतिसूर्यलक्षणाध्यायः
अथ प्रतिसूर्यलक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेव वर्णलक्षणं शुभाशुभफलं चाह—
प्रतिसूर्यकः प्रशस्तो दिवसकृदृतुवर्णसप्रभः स्निग्धः ।
वैदूर्यनिभः स्वच्छः शुक्लश्च क्षेमसौभिक्षः ॥१॥
सूर्य के ऋतु वर्ण (तीसरे अध्याय के तेईसवें पद्य में उक्त) के सदृश वर्ण का
प्रतिसूर्य होता है। यदि वह निर्मल, वैदूर्यमणि की तरह स्वच्छ और श्वेत हो तो क्षेम और
सुभिक्ष करता है॥१॥
प्रतिसूर्यो द्वितीयोऽर्कः स च दिवसकृत आदित्यस्य ऋतुवर्णसप्रभः आदित्यस्य ये
ऋतुवर्णा उक्तास्ताम्रः कपिलो वर्कः शिशिर इत्यादिकास्तेषां सदृशवर्णः। स्निग्धो
निर्मलकान्तिश्च शस्तः प्रशस्तः। तथा वैदूर्यनिभो वैदूर्यमणेः सदृशकान्तिः। नीलपीत इत्यर्थः।
स्वच्छो निर्मलः। शुक्लः श्वेतवर्णश्च। क्षेमसौभिक्षः, क्षेमं सौभिक्षं च करोति॥१॥
अन्यदप्याह—
पीतो व्याधिं जनयत्यशोकरूपश्च शस्त्रकोपाय ।
प्रतिसूर्याणां माला दस्युभयातङ्कनृपहन्त्री ॥२॥
पीत वर्ण का प्रतिसूर्य व्याधि करता है। अशोक पुष्प के समान लोहित वर्ण का
प्रतिसूर्य शस्त्रकोप के लिये होता है। यदि प्रतिसूर्य की माला दिखाई दे तो चोर का भय
तथा उपद्रव और राजा का नाश करता है॥२॥
पीतः पीतवर्णः प्रतिसूर्यो व्याधिं जनयत्युत्पादयति। अशोकरूपोऽशोकपुष्पसदृशवर्णो
लोहित इत्यर्थः। तथारूपः शस्त्रकोपाय भवति। शस्त्रकोपं करोति। प्रतिसूर्याणां माला
पङ्क्तिर्यदि दृश्यते तदा दस्युभयातङ्कनृपहन्त्री भवति, दस्यवश्चौरास्तेभ्यो भयमातङ्कमुपद्रवं
नृपं च राजानं हन्ति॥२॥
अन्यदप्याह—
दिवसकृतः प्रतिसूर्यो जलकृदुदग्दक्षिणे स्थितोऽनिलकृत् ।
उभयस्थः सलिलभयं नृपमुपरि निहन्त्यधो जनहा ॥३॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां प्रतिसूर्य-
लक्षणाध्यायः सप्तत्रिंशः ॥३७॥
यदि सूर्यमण्डल की उत्तर दिशा में प्रतिसूर्य दिखाई पड़े तो वृष्टि होती है, दक्षिण
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