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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 728 में से

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पृष्ठ 489

इन्द्रायुधलक्षणाध्यायः ४४७
करोति, तत्रैव दृष्टे वृष्ट्यां वृष्टिं निवारयति। पश्चात् पश्चिमायां दिशि दृष्टं सदैव सर्व-कालं
वृष्टिं वर्षणमाचष्टे कथयति।।६।।
अन्यदप्याह—
चापं मघोनः निशायामाखण्डलायां दिशि भूपपीडाम्।
याम्यापरोदक्प्रभवं निहन्यात् सेनापतिं नायकमन्त्रिणौ च ॥७॥
यदि रात्रि के समय पूर्व दिशा में इन्द्रधनुष दिखाई दे तो राजा को पीड़ित करता है
तथा दक्षिण दिशा में दिखाई दे तो सेनापति, पश्चिम में प्रधान पुरुष और उत्तर में इन्द्रधनुष
दिखाई दे तो मन्त्री का नाश करता है।।७।।
मघोन इन्द्रस्य चापं धनुः। आखण्डलायामैन्द्र्यां पूर्वस्यां दिशि निशायां रात्रौ दृष्टं
भूपस्य राज्ञः पीडां रोगभयं करोति। याम्यापरोदक्प्रभवं यथासङ्ख्यं सेनापतिं नायकमन्त्रिणौ
च निहन्यात्। याम्यायां दक्षिणस्यां सेनापतिम्। अपरस्यां पश्चिमायां नायकान् प्रधानपुरुषान्।
उत्तरस्यां मन्त्रिणं सचिवं हन्यात्। तथा च काश्यपः—
अवृष्टौ वर्षणं कुर्यादैन्द्रीं दिशमुपाश्रितम्।
पश्चिमायां महद्वर्षं करोतीन्द्रधनुः सदा।।
रात्रौ चेद् दृश्यते पूर्वे भयं नरपतेर्भवेत्।
याम्यायां बलमुख्यश्च विनाशमभिगच्छति।।
पश्चिमायां प्रधानस्य सौम्यायां मन्त्रिणो वधः।
स्निग्धवर्णैर्घनैः शुभ्रैर्वारुण्यां दिशि दृश्यते।।
बहूदकं सुभिक्षं च शिवं सस्यप्रदं भवेत्।। इति।।७।।
अन्यदप्याह—
निशि सुरचापं सितवर्णाद्यं जनयति पीडां द्विजपूर्वाणाम्।
भवति च यस्यां दिशि तद्देश्यं नरपतिमुख्यं नचिराद्धन्यात् ॥८॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायामिन्द्रायुध-
लक्षणाध्यायः पञ्चत्रिंशः ।।३५।।
यदि रात्रि के समय श्वेत आदि ( श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण ) वर्ण का इन्द्रधनुष
दिखाई दे तो ब्राह्मण आदि वर्णों का नाश करता है। जैसे श्वेत वर्ण का हो तो ब्राह्मणों का,
रक्त वर्ण का हो तो क्षत्रियों का, पीत वर्ण का हो तो वैश्यों का और कृष्ण वर्ण का हो तो
शूद्रों का नाश करता है तथा जिस दिशा में इन्द्रधनुष दिखाई देता है, उस दिशा के प्रधान
राजा का शीघ्र नाश करता है।।८।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायामिन्द्रायुधलक्षणाध्यायः पञ्चत्रिंशः ।।३५।।
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