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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 728 में से

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पृष्ठ 440

३९८ बृहत्संहिता
ददति। कीदृशाः। विच्छिन्नविषमेति। विच्छिन्नाः खण्डशो गताः। विषमा अतुल्याः,
विध्वस्ता नष्टवर्णाः। विकृता विकारं गताः। कुटिला अस्पष्टाः। अपसव्यप्रदक्षिणं
कृत्वा परिवृत्ताः परेवेष्टिताः। तनवः सूक्ष्माः। ह्रस्वा अदीर्घाः। विकलाः शक्तिरहिताः।
कलुषा अप्रसन्नाः।। ९।।
अथैषामेव विशेषलक्षणमाह—
उद्द्योतिनः प्रसन्ना ऋजवो दीर्घाः प्रदक्षिणावर्ताः ।
किरणाः शिवाय जगतो वितमस्के नभसि भानुमतः ॥१०॥
यदि अन्धकाररहित आकाश में तेजयुत, निर्मल, स्पष्ट, दीर्घ और दक्षिणावर्त क्रम से
परिवेष्टित सूर्य का किरण हो तो संसार का कल्याण करने वाला होता है।।१०।।
एवंविधाः किरणा रश्मयो भानुमत आदित्यस्य सम्बन्धिनो वितमस्के तमोरहिते
नभस्याकाशे दृष्टा जगतो विश्वस्य शिवाय श्रेयसे भवन्ति। कीदृशाः। उद्द्योतिनो दीप्ति-
मन्तः। प्रसन्ना निर्मलाः। ऋजवः स्पष्टाः। दीर्घा आयामिनः। प्रदक्षिणावर्ताः प्रदक्षिणेनावर्तो
येषां ते तथाविधाः।।१०।।
पूर्वमुक्तं यद्यमोघकिरणः सहस्रगोरिति तत्र न ज्ञायते। तदर्थममोघकिरणानां लक्षण-
माह—
शुक्लाः करा दिनकृतो दिवादिमध्यान्तगामिनः स्निग्धाः ।
अव्युच्छिन्ना ऋजवो वृष्टिकरास्ते त्वमोघाख्याः ॥११॥
सम्पूर्ण आकाश को व्याप्त करने वाले, निर्मल, अखण्डित और स्पष्ट सूर्य के किरण
अमोघ संज्ञक ( शुभ फल देने वाले ) होते हैं।।११।।
दिनकृत आदित्यस्य शुक्लाः श्वेतवर्णाः करा रश्मयो दिवादिमध्यान्तगामिनः। दिवे
नभसि आदौ मध्येऽन्ते च गमनशीलाः। सकलनभोव्यापिन इत्यर्थः। ते च स्निग्धा अरूक्षाः।
अव्युच्छिन्ना अखण्डाः। ऋजवः स्पष्टाः। ते त्वमोघाख्या अमोघसंज्ञा रविरश्मयः। ते च
दृष्टा वृष्टिकराः।।११।।
अथान्यद्रश्मिलक्षणमाह—
कल्माषबभ्रुकपिला विचित्रमाञ्जिष्ठहरितशबलाभाः ।
त्रिदिवानुबन्धिनोऽवृष्टयेऽल्पभयदास्तु सप्ताहात् ॥१२॥
कल्माष ( पीला, श्वेत और काला वर्ण मिश्रित ), थोड़े पीले, विचित्र, मञ्जीठ
( मजीठ ) की तरह हरे, काला-श्वेत दोनों मिले हुये और सम्पूर्ण आकाशमण्डल को
व्याप्त करके स्थित सूर्य के किरण दिखाई दें तो उसके सात दिन बाद से वृष्टि और थोड़ा
भय करते हैं।।१२।।
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