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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 435

कुसुमलताध्यायः ३९३
अथान्यदप्याह—
चम्पककुसुमैः कनकं विद्रुमसम्पच्च बन्धुजीवेन ।
कुरवकवृद्ध्या वज्रं वैडूर्यं नन्दिकावर्त्तः ॥८८॥
चम्पापुष्प की वृद्धि से सोना, बन्धुजीव से मूंगा, कुरवक से वज्र और नन्दिकावर्त
से वैदूर्य मणि की वृद्धि होती है॥८८॥
कनकं सुवर्णं चम्पकपुष्पैः। बन्धुजीवेन विद्रुमस्य सम्पत् सुलभत्वम्। वज्रं मणि-
विशेषस्तत्कुरववृद्ध्या। नन्दिकावर्त्तैर्वैडूर्यम्॥८८॥
अथान्यदप्याह—
विन्द्याच्च सिन्धुवारेण मौक्तिकं कारुकाः कुसुम्भेन ।
रक्तोत्पलेन राजा मन्त्री नीलोत्पलेनोक्तः ॥८९॥
सिन्धुवास से मोती, कुसुम्भ से केशर, रक्त कमल से राजा और नील कमल से
मन्त्री की वृद्धि देखनी चाहिये॥८९॥
सिन्धुवारो वृक्षविशेषस्तेन मौक्तिकं विन्द्याज्जानीयात्। कारुकाः शिल्पिनः कुसुम्भेन
महारजतेन। राजा नृपो रक्तोत्पलेनोक्तः। नीलोत्पलेन मन्त्री सचिवः॥८९॥
अन्यदप्याह—
श्रेष्ठी सुवर्णपुष्प्यात् पद्मैर्विप्राः पुरोहिताः कुमुदैः ।
सौगन्धिकेन बलपतिरर्केण हिरण्यपरिवृद्धिः ॥९०॥
सुवर्ण पुष्प से व्यापारी, कमल से ब्राह्मण, कुमुद से पुरोहित, सुगन्धित वस्तु से
सेनापति और आक से सोने की वृद्धि देखनी चाहिये॥९०॥
सुवर्णपुष्पात् श्रेष्ठी ज्ञेयः। पद्मैः कमलैर्विप्रा ब्राह्मणाः। कुमुदैः कैरवैः पुरोहिता नृपा-
चार्याः। बलपतिः सेनापतिः सौगन्धिकेन। हिरण्यस्य सुवर्णस्य परिवृद्धिरर्केण॥९०॥
अथान्यत्—
आम्रैः क्षेमं भल्लातकैर्भयं पीलुभिस्तथारोग्यम् ।
खदिरशमीभ्यां दुर्भिक्षमर्जुनैः शोभना वृष्टिः ॥९१॥
आम की वृद्धि से मनुष्यों को कुशल, भल्लातक से भय, पीलु से आरोग्य, खैर तथा
शमी से दुर्भिक्ष और अर्जुन वृक्ष से सुन्दर वृष्टि कहनी चाहिये॥९१॥
आम्रैश्चूतैः क्षेमं विन्द्यात्। भल्लातकैर्भयं भीतिम्। पीलुभिस्तथा आरोग्यमरोगित्वम्।
खदिरशमीभ्यां प्रवृद्धाभ्यां दुर्भिक्षं भवति। अर्जुनैः शोभना वृष्टिः, सुवृष्टिर्भवतीत्यर्थः।
अन्यदप्याह—
पिचुमन्दनागकुसुमैः सुभिक्षमथ मारुतः कपित्थेन ।
निचुलैनावृष्टिभयं व्याधिभयं भवति कुटजेन ॥९२॥
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