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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 434

३९२ बृहत्संहिता
जामुन से तिल, माष आदि, शिरीष ( शिरस ) से प्रियङ्गु ( ककुनी = कौनी ),
महुए से गेहूँ और सप्तवर्ण वृक्ष पर फल, फूल की वृद्धि से यव की वृद्धि जाननी चाहिये।
जम्बुवृक्षविशेषस्ताभिर्जम्बूभिस्तिलमाषा ज्ञातव्याः। शिरीषो वृक्षविशेषस्तद्वृद्ध्या
कङ्गुनिष्पत्तिः। कङ्गुः प्रियङ्गुः। मधूको वृक्षविशेषः। तैर्मधूकैर्गोधूमा ज्ञेयाः। सप्तपर्णो
वृक्षविशेषस्तेन यववृद्धिर्भवति।।४।।
अथान्यत्—
अतिमुक्तककुन्दाभ्यां कार्पासं सर्षपान् वदेदशनैः ।
बदरीभिश्च कुलत्थांश्चिरबिल्वेनादिशेन्मुद्गान् ॥५॥
वासन्ती लता और कुन्द पुष्पों में फल-पुष्पों की वृद्धि से कपास, असना से सरसों,
बेर से कुलथी और करञ्ज में फल-पुष्पों की वृद्धि से मूंग की वृद्धि जाननी चाहिये ।।५।।
अतिमुक्तको वृक्षविशेषः कुन्दश्च यत्र कुन्दपुष्पाणि भवन्ति। ताभ्यामतिमुक्तककुन्दाभ्यां
कार्पासं वदेत् ब्रूयात्। अशनो वृक्षविशेषस्तैः सर्षपान् वदेद् ब्रूयात्। बदरीभिश्च कुलत्थान्
वदेत्। चिरबिल्वेन करञ्जेन मुद्गानादिशेद् ब्रूयात् ।।५।।
अन्यदप्याह—
अतसी वेतसपुष्पैः पलाशकुसुमैश्च कोद्रवा ज्ञेयाः ।
तिलकेन शङ्खमौक्तिकरजतान्यथ चेङ्गुदेन शणाः ॥६॥
वेतस वृक्ष में फल-पुष्पों की वृद्धि से असली ( तीसी ), पलास से कोदों, तिलक
से शंख, मोती और चाँदी की तथा इङ्गुदी वृक्षों में फल-पुष्पों से सन की वृद्धि जाननी चाहिये।
वेतसो वृक्षविशेषस्तत्पुष्पैरतसी ज्ञेया ज्ञातव्या। पलाशकुसुमैः पलाशवृक्षपुष्पैः कोद्रवा
ज्ञेया ज्ञातव्याः। तिलको वृक्षविशेषस्तेन शङ्खमौक्तिकरजतानि शङ्खः प्रसिद्धः, मौक्तिकं
मुक्ताफलानि, रजतं रूप्यम्, एतानि विज्ञेयानि। अथानन्तरमिङ्गुदेन वृक्षविशेषेण शणा
विज्ञेयाः ।।६।।
अथान्यत्—
करिणश्च हस्तिकर्णैरादेश्या वाजिनोऽश्वकर्णेन ।
गावश्च पाटलाभिः कदलीभिरजाविकं भवति ॥७॥
हस्तिकर्ण वृक्ष पर फल-पुष्पों की वृद्धि से हाथी, अश्वकर्ण से घोड़ा, पाटला से गाय
और कदली वृक्ष पर फल-पुष्पों की वृद्धि से बकरी, भेड़ आदि की वृद्धि होती है ।।७।।
हस्तिकर्णैः करिणो गजा आदेश्या वक्तव्याः। वाजिनोऽश्वास्ते चाश्वकर्णेन एतौ द्वावपि
सुप्रसिद्धौ। पाटलां वृक्षजातिस्ताभिर्गावः। अजश्चच्छागोऽविर्मेषः। अजाविकं कदलीभी
रम्भाभिर्भवति ।।७।।
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