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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

३९४ बृहतसंहिता
निम्ब और नागकेसर पर पुष्पों की वृद्धि से सुभिक्ष, कपित्थ से वायु, निचुल से
अवृष्टि का भय और कुटज से व्याधिभय का ज्ञान करना चाहिये।।१२।।
पिचुमन्दो निम्बवृक्षः, नागो नागकेसर इति प्रसिद्धः, तयोः पुष्पैः सुभिक्षं ज्ञेयम्।
अथ कपित्थेन मारुतो वायुः। कपित्थो वृक्षविशेषः। निचुलेन वृक्षविशेषेण अवृष्टिभयं
भवति। निचलो जलवेतसवृक्षः। कुटजेन व्याधिभयं भवति।।१२।।
अन्यदप्याह—
दूर्वाकुशकुसुमाभ्यामैक्षुर्वह्निश्च कोविदारेण।
श्यामालताभिवृद्ध्या बन्धक्यो वृद्धिमायान्ति ।।१३।।
दूब और कुश के पुष्पों की वृद्धि से ईख (गन्ना), कचनार से आग और श्याम
लता की वृद्धि से वेश्या, व्यभिचारिणी आदि स्त्री की वृद्धि होती है।।१३।।
दूर्वा शाद्वलम्। कुशो दर्भः। तत्कुसुमाभ्यां तत्पुष्पाभ्यामैक्षुर्भवति। कोविदारेण च वह्नि-
रग्निः। श्यामालता लतैव प्रसिद्धा। तदभिवृद्ध्या बन्धक्यो वेश्या वृद्धिमायान्ति प्राप्नुवन्ति।
अथैताभिर्वृष्टिलक्षणमाह—
यस्मिन् काले स्निग्धनिश्छिद्रपत्राः
सन्दृश्यन्ते वृक्षगुल्मा लताश्च।
तस्मिन् वृष्टिः शोभना सम्प्रदिष्टा
यक्षैश्छिद्रैरल्पमम्भः प्रदिष्टम् ।।१४।।
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहतसंहितायां कुसुमलतानामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ।।२९।।
जिस समय वृक्षगुल्म (फैली लता) और लताओं के पत्ते चिकने तथा छिद्ररहित
दिखाई दें, उस समय सुन्दर वृष्टि होती है। यदि वे (पत्ते) रूक्ष और छिद्रयुक्त हों तो
थोड़ी वृष्टि होती है।।१४।।
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां कुसुमलताध्याय एकोनत्रिंशः ।।२९।।
वृक्षास्तरवः, गुल्म एकमूलो विटपः, लताः प्रसिद्धाः, एते यस्मिन् काले स्निग्धा
निर्मला निश्छिद्रपत्राः, छिद्ररहितैः पत्रैः सन्दृश्यन्ते तस्मिन् काले शोभना वृष्टिः प्रदिष्टा उक्ता।
तैरेव रूक्षैरस्निग्धैश्छिद्रैश्चाल्पं परिमितमम्भः पानीयं प्रदिष्टमुक्तम्। तथा च पराशरः—
अच्छिद्रपत्राः सुस्निग्धाः फलपुष्पसमन्विताः।
निर्दिशन्ति शुभं वृक्षा विपरीतं विगर्हिताः।। इति ।।१४।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ कुसुमलता नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ।।२९।।
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