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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 728 में से

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पृष्ठ 351

अथ ग्रहवर्षफलाध्यायः
अथ ग्रहवर्षफलाध्यायो व्याख्यायते। कस्य ग्रहस्य कस्मिन् वर्षे कीदृशानि शुभा-
शुभानि फलानि भवन्तीति। यत आचार्येण पूर्वमेव प्रतिज्ञातमासीत्—
वर्षे यद्यस्य फलं मासे च मुनिप्रणीतमालोक्य।
तत्तद्त्तैर्वक्ष्ये होरातन्त्रोत्तरविधाने।। इति।
तत्रादावेवादित्यस्य वर्षफलमाह—
सर्वत्र भूर्विरलसस्ययुता वनानि
दैवाद् बिभक्षयिषुदंष्ट्रिसमावृतानि।
नद्यश्च नैव हि पयः प्रचुरं स्रवन्ति
रुग्भेषजानि न तथातिबलान्वितानि ॥१॥
तीक्ष्णं तपत्यदितिजः शिशिरेऽपि काले
नात्यम्बुदा जलमुचोऽचलसन्निकाशाः।
नष्टप्रभर्क्षगणशीतकरं नभश्च
सीदन्ति तापसकुलानि सगोकुलानि ॥२॥
हस्त्यश्वपत्तिमदसह्यबलैरुपैता
बाणासनासिमुशलातिशयाश्चरन्ति ।
घ्नन्तो नृपा युधि नृपानुचरैश्च देशान्
संवत्सरे दिनकरस्य दिनेऽथ मासे ॥३॥
सूर्य से वर्ष, मास या दिन में पृथिवी पर सब जगह अल्प धान्य, दैववश भक्षण की
इच्छा करने वाले दंष्ट्रीगण ( सर्प, सूअर आदि जन्तुओं ) से संयुत वन, नदियों में अल्प जल,
रोगनाश के लिये वीर्ययुत ओषधि का अभाव, शिशिर काल ( माघ-फाल्गुन ) में भी सूर्य
का भयङ्कर ताप, पर्वत के समान मेघ से भी अधिक वृष्टि का अभाव, आकाशस्थित नक्षत्र
और चन्द्र में दीप्ति का अभाव, तपस्वीगण शोकयुत और गौओं के समुदाय दुःखी होते हैं।
संग्राम में हाथी, घोड़ा, पदातियों से युत असह्य सैन्य, धनु, खड्ग और मुशलों से युत
मन्त्री आदि के साथ होकर राजा लोग देशों का नाश करते हुये विचरण करते हैं॥१-३॥
दिनकरस्यादित्यस्य संवत्सरे वर्षे दिने वा तद्वारे मासे वा ईदृशानि फलानि भवन्ति।
तथा च यवनेश्वरः—
अब्दाश्रयं लक्षणमीरितं यद् ग्रहस्वभावप्रभवं जनानाम्।
तदेव तन्मासदिनर्तुषूक्तं तदीश्वरस्थानविकल्पितं च।।
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