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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 728 में से

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पृष्ठ 340

२९८ बृहत्संहिता
अत्रैव विशेषमाह—
पौरे पौरेण हते पौराः पौरान् नृपान् विनिघ्नन्ति।
एवं याय्याक्रन्दा नागरयायिग्रहाश्चैव ॥१८॥
यदि पौर ग्रह से पौर ग्रह पीड़ित हो तो पुरवासी राजाओं से पुरवासी राजा का नाश
होता है। इसी तरह यायी ग्रह से आक्रन्द ग्रह पीड़ित हो तो यायी मनुष्य से आक्रन्द मनुष्य
का और आक्रन्द ग्रह से यायी पीड़ित हो तो आक्रन्द से यायी का नाश होता है तथा नागर
ग्रह से यायी पीड़ित हो तो नागर मनुष्य से यायी का और यायी ग्रह से नागर ग्रह पीड़ित
हो तो यायी मनुष्य से नागर मनुष्य का नाश होता है॥१८॥
पौरेण नागरेण ग्रहेण पौरे ग्रहे हते विजिते सति पौरा नृपाः पौरान् नृपानेव विनि-
घ्नन्ति नाशयन्ति। एवमनेन प्रकारेण याय्याक्रन्दाः परस्परं विनिघ्नन्ति। नागरयायिग्रहाश्चैव-
मपि जिताः परस्परं विनिघ्नन्ति। तथा च पराशरः—
तेषां तज्जयाद्विजयो वधाद् वधोऽन्योन्यभेदाद्भेदः साम्यात् साम्यम्॥१८॥
अथ जितलक्षणमाह—
दक्षिणदिक्स्थः परुषो वेपथुरप्राप्य सन्निवृत्तोऽणुः।
अधिरूढो विकृतो निष्प्रभो विवर्णश्च यः स जितः ॥१९॥
दक्षिण दिशा में स्थित, रूक्ष, कम्पायमान, दूसरे ग्रह के पास में नहीं जाकर लौटने
वाला, सूक्ष्म बिम्ब वाला, अन्य ग्रह से आक्रान्त, विकारयुत, किरणरहित, विवर्ण—इन
लक्षणों से युत ग्रह पराजित होते हैं॥१९॥
यो ग्रहो दक्षिणदिक्स्थो याम्याशास्थः। परुषो रूक्षो निःस्नेहः। वेपथुः सकम्पः।
अन्यग्रहमप्राप्य सन्निवृत्तो निवर्तितः। विपरीतां गतिमापन्नः। अणुः सूक्ष्मः। अधिरूढो-
ऽन्येनाऽऽक्रान्तः। विकृतो विकारं गतः। निष्प्रभो दीप्तिरहितः। विवर्णो विगतवर्णः। स
जित इति। तथा च पराशरः—
‘दशभिर्लक्षणैर्ग्रहं जितं विन्द्यात्। विवर्णः परुषः सूक्ष्मो याम्याशामार्गस्थोऽधिरूढो
निष्प्रभो विकृतोऽभिहतोऽप्राप्य निवृत्तो वेपनश्च। अन्यथा विजयी’। तथा च गर्गः—
अरश्मिर्लोहितः श्यामः परुषः सूक्ष्म एव च।
अपसव्यगतो यश्च चक्रान्तःपतितस्तथा।।
च्युतः स्थानाद्धतो यश्च प्रतिस्तब्धस्तथैव च।
निष्प्रभो विकृतश्चापि जवेनाभिहतश्च यः।।
अप्राप्य वा निवृत्तो यो वेपनः कृष्ण एव च।
लक्षणैः सप्तदशभिर्ग्रहं विन्द्यात् पराजितम्।।१९।।
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