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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

सप्तर्षिचाराध्यायः २५५
शकयवनदरदपारतकाम्बोजांस्तापसान् वनोपेतान्।
हन्ति वसिष्ठोऽभिहतो विवृद्धिदो रश्मिसम्पन्नः॥९॥
अङ्गिरसो ज्ञानयुता धीमन्तो ब्राह्मणाश्च निर्दिष्टाः।
अत्रेः कान्तारभवा जलजान्यम्भोनिधिः सरितः॥१०॥
रक्षःपिशाचदानवदैत्यभुजङ्गाः स्मृताः पुलस्त्यस्य।
पुलहस्य तु मूलफलं क्रतोस्तु यज्ञाः सयज्ञभृतः॥११॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां
सप्तर्षिचाराध्यायस्त्रयोदशः ॥१३॥
यदि मरीचि पीड़ित हों तो गन्धर्व, देव, राक्षस, मन्त्र, ओषधि, सिद्ध, यक्ष, नाग और
विद्याधरों को पीड़ित करते हैं तथा निर्मल और विपुल हों तो उनकी वृद्धि करते हैं। यदि
वसिष्ठ पीड़ित हों तो शक, यवन, दरद, पारत, काम्बोज, तपस्वी और वनवासियों को
पीड़ित करते हैं तथा किरणों से सम्पन्न हों तो उनकी वृद्धि करते हैं। यदि अङ्गिरा पीड़ित
हों तो ज्ञानी, बुद्धिमान् और ब्राह्मणों को पीड़ित करते हैं तथा निर्मल और विपुल हों तो
उनकी वृद्धि करते हैं। यदि अत्रि पीड़ित हों तो वन तथा जल में उत्पन्न होने वाले द्रव्य,
समुद्र और नदियों को पीड़ित करते हैं तथा विपुल और स्निग्ध हों तो उनकी वृद्धि करते
हैं। यदि पुलस्त्य पीड़ित हों तो राक्षस, पिशाच, दानव, दैत्य और सर्पों को पीड़ित करते हैं
तथा स्निग्ध और विपुल हों तो उनकी वृद्धि करते हैं। यदि पुलह पीड़ित हों तो मूल और
फलों को पीड़ित करते हैं तथा स्निग्ध और विपुल हों तो उनकी वृद्धि करते हैं। यदि क्रतु
पीड़ित हों तो यज्ञ और यज्ञकर्ताओं को पीड़ित करते हैं तथा स्निग्ध और विपुल हों तो
उनकी वृद्धि करते हैं॥८-११॥
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां सप्तर्षिचाराध्यायस्त्रयोदशः ॥१३॥
गन्धर्वा अश्वमुखा नरदेवयोनयः। देवाः सुराः। दानवा दनुपुत्राः। मन्त्राः। औषधयः।
सिद्धा देवयोनयः। यक्षाः। नागा एतेषां सर्वेषाम्। तथा विद्याधराणां देवयोनीनां मरीचिरुप-
तप्तः पीडाकरः। स्निग्धो विपुलश्च वृद्धिप्रदः।
शकयवनेति। शका जनाः। यवनाः। दरदाः। पारताः। काम्बोजाः। तापसाः
तपोनिरताः। वनोपेता वनस्था एतान् वसिष्ठोऽभिहत उपतप्तो हन्ति। रश्मिसम्पन्नो
निरुपहतो विवृद्धिदो वृद्धिप्रदः।
अङ्गिरस इति। ज्ञानयुता ज्ञानोपेताः। धीमन्तो बुद्धिमन्तः। ब्राह्मणा द्विजा। एते
अङ्गिरसो विनिर्दिष्टाः कथिताः।
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