बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ बृहत्संहिता
यदि पुनर्वसु नक्षत्र में शनैश्चर स्थित हो तो पञ्जाब, गुहा, सौराष्ट्र, सिन्धु के समीप
तथा सौवीर देश में रहने वाले लोगों को पीड़ित करता है। यदि शनैश्चर पुष्य नक्षत्र में
स्थित हो तो घण्टा बजाने वाले, घोषिक ( ढींढोरा पीटने वाले अथवा घोष-गुहा में
निवास करने वाले ), यवन, वणिक्, किरात, धूर्त और पुष्पों को पीड़ित करता है।।६।।
आदित्ये पुनर्वसौ स्थिते सौरे पाञ्चनदा जनाः। प्रत्यन्ता गह्वरवासिनः। सुराष्ट्रो देशः।
सैन्धवाः। सौवीराः। एते पीड्यन्ते। पुष्ये स्थिते सौरे घाण्टिका घण्टावादनं शिल्पमस्येति
घाण्टिकाः। घोषः शब्दोच्चारणं शिल्पमस्येति घोषिकाः श्रावका इत्यर्थः। अथवा घोषे
गह्वरे निवसन्ति ते घोषिकाः। यवना जनाः। वणिजः किराताः। कितवा द्यूतकराः। कुसु-
मानि पुष्पाणि। एतानि पीड्यन्ते।।६।।
आश्लेषामघयोराह—
सार्पे जलरुहसर्पाः पित्र्ये बाह्लीकचीनगान्धाराः ।
शूलिकपारतवैश्याः कोष्ठागाराणि वणिजश्च ॥७॥
यदि आश्लेषा नक्षत्र में शनैश्चर बैठा हो तो जल में उत्पन्न प्राणियों और सर्पों को
पीड़ित करता है। यदि मघा नक्षत्र में शनैश्चर बैठा हो तो बाह्लीक, चीन, गान्धार, शूलिक
और पारत देश में रहने वाले मनुष्य, वैश्य, कोष्ठागार, वणिक्, किरात—इनको पीड़ित
करता है।।७।।
सार्पे आश्लेषायां जलरुहा जलोद्भवाः प्राणिनो द्रव्याणि वा। सर्पा उरगाश्च पीड्यन्ते।
तथा च गर्गः—
भुजङ्गकच्छपग्राहनागमत्स्यसरीसृपान्।
हन्यादर्कसुतस्तिष्ठन्नक्षत्रे सर्पदैवते।।
पित्र्ये मघायां बाह्लीकाः। चीनाः गान्धाराः। शूलिकाः। पारताः। सर्व एव जनाः।
वैश्या वैश्यवर्णाः। कोष्ठागाराण्यविलयग्रामाः। वणिजश्च किराताः। पीड्यन्त इति सर्वत्र
योज्यम्।।७।।
अथ पूर्वफल्गुन्युत्तरफल्गुन्योराह—
भाग्ये रसविक्रयिणः पण्यस्त्रीकन्यकामहाराष्ट्राः ।
आर्यम्णे नृपगुडलवणभिक्षुकाम्बूनि तक्षशिला ॥८॥
पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में स्थित शनैश्चर रस ( मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु और
कषाय ) बेचने वाले, वेश्या, कुमारी, महाराष्ट्र देश में निवास करने वाले मनुष्य—इन
सबों को पीड़ित करता है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में स्थित शनैश्चर राजा, गुड़, नमक,
भिक्षुक, जल और तक्षशिला नगरी को पीड़ित करता है।।८।।
भाग्ये पूर्वफल्गुन्यां रसविक्रयिणः। रसाः षट् मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायाः। एषां
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