बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 247, कुल 728 में से
संदर्भ में पढ़ेंशनैश्चरचाराध्यायः २०७
और मन्त्रियों को नाश करता है। यदि भरणी नक्षत्र में स्थित हो तो नाचने, बजाने, गाने
वाले, अन्याय पथ पर चलने वाले तथा निषाद—इन सबों का नाश करता है।।३।।
अर्कजः सौरः। अश्विगतः अश्विन्यामवस्थितः। तुरगानश्वान्। तुरगाणां य उपचारकास्तान्
तुरगोपचारकान्। तथा कवीन् काव्यकुशलान्। वैद्यान् कायचिकित्सकान्। अमात्यान्
मन्त्रिणश्च। हन्ति नाशयति। याम्ये भरण्यां नर्तनं शिल्पमस्येति नर्तकः। वादनं शिल्पम-
स्येति वादकः। गेयं जानातीति गेयज्ञः। क्षुद्रोऽन्यायवर्ती। नैकृतिको निषादः। एतान् हन्ति
नाशयति।।३।।
अथ कृत्तिकारोहिण्योराह—
बहुलास्थे पीड्यन्ते सौरेऽग्न्युपजीविनश्चमूपाश्च।
रोहिण्यां कोशलमद्रकाशिपाञ्चालशाकटिकाः ॥४॥
यदि कृत्तिका नक्षत्र में शनैश्चर बैठा हो तो अग्नि से आजीविका चलाने वालों और
सेनापति का नाश करता है। यदि रोहिणी नक्षत्र में शनैश्चर स्थित हो तो कोशल, मद्र, काशी
तथा पाञ्चाल देश में रहने वाले मनुष्यों और गाड़ी से आजीविका चलाने वालों का नाश
करता है।।४।।
सौरे शनैश्चरे बहुलासु कृत्तिकास्ववस्थिते अग्न्युपजीविनोऽग्निवार्ताः सुवर्णकारलोहकारा-
यस्कारप्रभृतयः। चमूपाः सेनापतयः। एते पीड्यन्ते। रोहिण्यां स्थिते सौरे कोशला जनाः।
मद्राः। काशयः। पाञ्चालाः। एते जनाः। शाकटिकाः शकटोपजीविनः। एते पीड्यन्ते।।४।।
अथ मृगशिरआर्द्रयोराह—
मृगशिरसि वत्सयाजकयजमानार्यजनमध्यदेशाश्च।
रौद्रस्थे पारतरमठास्तैलिकरजकचौराश्च ॥५॥
यदि मृगशिर नक्षत्र में शनैश्चर स्थित हो तो वत्स देश में रहने वाले मनुष्य, याजक,
यजमान, प्रधान मनुष्य और मध्यदेश को पीड़ित करता है। यदि शनैश्चर आर्द्रा में स्थित हो
तो पारतर देश में रहने वाले, मद्र देश में रहने वाले, तेली, रजक (धोबी, रंगरेज) और
चोरों को पीड़ित करता है।।५।।
मृगशिरसि स्थिते सौरे वत्सजनाः। याजकाः। यजन्तीति याजका ऋत्विजः। यज-
माना याज्ञिकाः। आर्यजनाः प्रधानजनाः। मध्यदेशाः प्रसिद्धाः। एते पीड्यन्ते। रौद्रस्थे
आर्द्रस्थे पारतरा जनाः। मठा जना एव। तैलिकाः प्रसिद्धाः। रजका वस्त्ररागकृतः।
चौरास्तस्कराः। एते पीड्यन्ते।।५।।
अथ पुनर्वसुतिष्ययोराह—
आदित्ये पाञ्चनदप्रत्यन्तसुराष्ट्रसिन्धुसौवीराः।
पुष्ये घाण्टिकघौषिकयवनवणिक्कितवकुसुमानि ॥६॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA