बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तर, मध्य और दक्षिण मार्ग में स्थित हैं। जैसे—नाग उत्तर मार्ग में, गज मध्य मार्ग में,
ऐरावत दक्षिण मार्ग में, वृष उत्तर मार्ग में, गो मध्य मार्ग में, जरद्गव दक्षिण मार्ग में, मृग
उत्तर मार्ग में, अज मध्य मार्ग में और दहन दक्षिण मार्ग में स्थित है। अतः नाग उत्तरोत्तर
मार्ग में, गज उत्तर-मध्य मार्ग में, ऐरावत उत्तर-दक्षिण मार्ग में, वृष मध्योत्तर मार्ग में, गो
मध्यमध्य मार्ग में, जरद्गव मध्य दक्षिण मार्ग में, मृग दक्षिणोत्तर मार्ग में, अज दक्षिण मध्य
मार्ग में और दहन दक्षिण-दक्षिण मार्ग में स्थित है॥४॥
तासां नागाद्यानां नवानां वीथीनां क्रमात् परिपाट्या तिस्रस्तिस्रो वीथय उदङ्मध्य-
याम्यमार्गस्थाः। उत्तरे मार्गे मध्ये मध्यमे याम्ये दक्षिणे च स्थिताः। तद्यथा—नागगजैरावत्य
उत्तरमार्गस्थाः। वृषभगोजारद्गव्यो मध्यममार्गस्थाः। मृगाजदहना दक्षिणमार्गस्था। तासामपि
वीथीनामुत्तरमध्यमदक्षिणमार्गस्थानामुत्तरमध्यदक्षिणैनेकैका स्थिता। तद्यथा—नागा उत्तरोत्तरा।
गजा उत्तरमध्यमा। ऐरावती उत्तरदक्षिणा। तथा वृषभा मध्योत्तरा। गोवीथी मध्यमध्या।
जरद्गववीथी मध्यदक्षिणा। तथा मृगा दक्षिणोत्तरा। अजा दक्षिणमध्यमा। दहना दक्षिण-
दक्षिणा इति। तथा च पराशरः—
‘अथ मार्गास्त्रयो भवन्त्युत्तरमध्यमदक्षिणाः। पुरनेकैकशस्त्रिधा नव वीथय इत्याचक्षते।
तत्रोत्तरे नागगजैरावत्यः। मध्ये वृषभगोजारद्गव्यः। दक्षिणे मृगाजदहनाः। तासां नागाऽऽग्नेय-
याम्यवायव्यानि। गजवीथी रोहिण्यादीनि त्रीणि। चत्वारि परमैरावती। वृषभा फल्गुन्यौ।
गोवीथी प्राक्प्रोष्ठपदादीनि चत्वारि। श्रवणधनिष्ठावरुणानि जारद्रवी। मृगवीथी त्वाष्ट्रहस्तम्।
आजी मैत्रमिन्द्राग्न्यधिपमैन्द्रम्। मूलमषाढाद्वयं च वैश्वानरीमितीच्छन्ति।’
अत्र वराहमिहिरेण सह भेदः। तथा च गर्गः—
कृत्तिका भरणी स्वाती नागवीथी प्रकीर्तिता।
रोहिण्याद्यास्त्रिभास्तिस्रो गजैरावतवार्षभाः॥
अहिर्बुध्न्याश्विपौष्णं च गोवीथीति प्रकीर्तिता।
श्रवणत्रितयं ज्ञेया वीथी जारद्रवीति सा॥
मैत्रत्रिभा मृगाख्या स्याद्धस्तचित्राविशाखिका।
अजवीथी तु दहनाषाढायुग्ममिति स्मृता॥
पूर्वोत्तरा नागवीथी गजवीथी तदुत्तरा।
ऐरावती ततो याम्या एतास्तूत्तरतः स्मृता।
आर्षभी तु चतुर्थी स्याद् गोवीथी पञ्चमी स्मृता।
षष्ठी जारद्रवी ज्ञेया तिस्रस्ता मध्यमाश्रिताः॥
सप्तमी मृगवीथी स्यादजवीथी तथाष्टमी।
दहना नवमी ज्ञेया दक्षिणं मार्गमाश्रिताः॥
तथा च समाससंहितायाम्—