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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 728 में से

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पृष्ठ 225

शुक्रचाराध्यायः १८५
त्रिष्वश्विन्यादिषु यदा चरति भृगुनन्दनः ।
नागवीथीति सा ज्ञेया प्रथमान्या निबोधत ।।
रोहिण्यादिगजा ज्ञेयाऽदित्याद्यैरावती स्मृता ।
मघाद्या वृषभा ज्ञेया हस्ताद्या गौः प्रकीर्तिता ।।
जारद्रवी विशाखाद्या मूलाद्या मृगवीथिका ।
अजवीथी विष्णुभाद्याऽजाद्या तु दहना स्मृता ।। इति ।। १ ।।
अथ स्वमतेन प्रविभागमाह—
नागा तु पवनयाम्यानलानि पैतामहात्रिभास्तिस्रः ।
गोवीथ्यामश्विन्यः पौष्णं द्वे चापि भद्रपदे ।। २ ।।
जारद्गव्यां श्रवणात्त्रिभं मृगाख्या त्रिभं तु मैत्राद्यम् ।
हस्तविशाखात्वाष्ट्राण्यजेत्यषाढाद्वयं दहना ।। ३ ।।
अपने मत से वीथियों में नक्षत्रविभाग कहते हैं—स्वाती, भरणी और कृत्तिका में
नागवीथि; रोहिणी, मृगशिर और आर्द्रा में गजवीथि; पुनर्वसु, पुष्य और आश्लेषा में
ऐरावतवीथि; मघा, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी में बृषवीथि; अश्विनी, रेवती, पूर्वाभाद्रपदा,
उत्तराभाद्रपदा—इन चार नक्षत्रों में गोवीथि; श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा में जरद्गववीथि;
अनुराधा, ज्येष्ठा और मूल में मृगवीथि; हस्त, विशाखा और चित्रा में अजवीथि तथा
पूर्वाषाढा एवं उत्तराषाढा—इन दो नक्षत्रों में दहनवीथि होती है ।। २-३ ।।
पवनः स्वातिः । याम्यं भरणी । अनलः कृत्तिकाः । एतानि नक्षत्राणि नागवीथी ।
पैतामहात्रिभास्तिस्रः । पैतामहं रोहिणी तत आरभ्य त्रिभास्त्रिभिस्त्रिभिर्भैर्नक्षत्रैस्तिस्रो वीथयो
भवन्ति । तद्यथा—रोहिणीमृगशिरआर्द्रा गजवीथी । पुनर्वसुतिष्याश्लेषा ऐरावती । मघा पूर्व-
फल्गुनी उत्तरफल्गुनी चेति वृषभा । गोवीथ्यामिति । अश्विन्यः पौष्णं रेवती द्वे भद्रपदे
पूर्वभद्रपदोत्तरभद्रपदे । एतानि चत्वारि नक्षत्राणि गोवीथी ।
जारद्गव्यामिति । श्रवणात्प्रभृति त्रिभं नक्षत्रत्रयं श्रवणा धनिष्ठा शतभिषगिति जार-
द्गव्याम् । मृगाख्या त्रिभं तु मैत्राद्यम् । मैत्रमनुराधा तदाद्यं त्रिभं नक्षत्रत्रितयम् । अनुराधा ज्येष्ठा
मूलमिति मृगाख्या । तुशब्दः पादपूरणे । हस्तो विशाखा त्वाष्ट्रं चित्रा । एतानि नक्षत्राण्यजा
अजवीथी । अषाढाद्वयं पूर्वाषाढोत्तराषाढा चेति दहनवीथी ।। २-३ ।।
अथ तासां मार्गप्रविभागमाह—
तिस्रस्तिस्रस्तासां क्रमादुदङ्मध्ययाम्यमार्गस्थाः ।
तासामप्युत्तरमध्यदक्षिणेन स्थितैकैका ।। ४ ।।
नाग आदि तीन-तीन वीथियाँ क्रम से उत्तर, मध्य और दक्षिण में स्थित होती हैं । जैसे
नाग, गज और ऐरावत उत्तर मार्ग में; वृष, गो और जरद्गव मध्य मार्ग में तथा मृग, अज
और दहन दक्षिण मार्ग में स्थित होती हैं। इन तीन-तीन वीथियों में भी एक-एक क्रम से
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