बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ शुक्रचाराध्यायः
अथ शुक्रचारो व्याख्यायते। तस्य च नव वीथयस्त्रयो मार्गा उदङ्मध्यदक्षिणा। वातव्या-
डवैश्वानरास्त्रयो मार्गभेदाः षड् मण्डलानि भवन्ति। तत्रादावेव परमतेन वीथीनां लक्षणमाह—
नागगजैरावतवृषभभोजरद्गवमृगाजदहनाख्याः ।
अश्विन्याद्याः कैश्चित्त्रिभाः क्रमाद्वीथयः कथिताः ॥१॥
शुक्र की नव वीथियाँ, तीन मार्ग एवं छः मण्डल होते हैं। उनमें मतान्तर से प्रथमतः
वीथियों के नक्षत्रों को कहते हैं—
अश्विनी आदि तीन-तीन नक्षत्रों में क्रम से नाग, गज, ऐरावत, वृष, गो, जरद्गव, मृग,
अज, दहन—ये नव वीथियाँ होती हैं। जैसे—अश्विनी, भरणी और कृत्तिका में नागवीथि;
रोहिणी, मृगशिर और आर्द्रा में गजवीथि; पुनर्वसु, पुष्य और आश्लेषा में ऐरावतवीथि;
मघा, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरफाल्गुनी में वृषवीथि; हस्त, चित्रा और स्वाती में गोवीथि;
विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा में जरद्गववीथि; मूल, पूर्वाषाढा और उत्तराषाढा में मृगवीथि;
श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा में अजवीथि तथा पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा और रेवती में
दहन नाम की वीथि होती है॥१॥
स्फुटार्थ चक्र
| वीथियाँ | नाग | गज | ऐरावत | वृष | गौ | जरद्गव | मृग | अज | दहन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | अश्विनी | रोहिणी | पुनर्वसु | मघा | हस्त | विशा. | मूल | श्रवण | पू. भा. |
| क्ष | भरणी | मृगशिरा | पुष्य | पू.फा. | चित्रा | अनुरा. | पू. षा. | धनिष्ठा | उ. भा. |
| त्र | कृत्तिका | आर्द्रा | आश्लेषा | उ.फा. | स्वाती | ज्येष्ठा | उ. षा. | शतभि. | रेवती |
नागवीथी प्रथमा। गजवीथी द्वितीया। ऐरावतवीथी तृतीया। वृषभवीथी चतुर्थी।
गोवीथी पञ्चमी। जगद्गववीथी षष्ठी। मृगवीथी सप्तमी। अजवीथी अष्टमी। दहनवीथी
नवमी। एता नव वीथयः कैश्चिदाचार्यैर्देवलप्रभृतिभिरश्विन्याद्यास्त्रिभास्त्रिभिर्भैर्नक्षत्रैः कथिता।
अश्विनीभरणीकृत्तिका नागवीथी। रोहिणीमृगशिरआर्द्रा गजवीथी। पुनर्वसुतिष्याश्लेषा
ऐरावतवीथी। एवं क्रमेण त्रिभिस्त्रिभिर्नक्षत्रैरन्या अपि ज्ञेयाः। एताः क्रमात् परिपाट्या
वीथयः कथिता उक्ताः। तथा च देवलः—
अश्विन्यादित्रिभाः सर्वा नागाद्या दहनान्तिकाः।
वीथयो भृगुपुत्रस्य नव प्रोक्ताः पुरातनैः॥
तथा च काश्यपः—