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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 728 में से

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पृष्ठ 224

अथ शुक्रचाराध्यायः
अथ शुक्रचारो व्याख्यायते। तस्य च नव वीथयस्त्रयो मार्गा उदङ्मध्यदक्षिणा। वातव्या-
डवैश्वानरास्त्रयो मार्गभेदाः षड् मण्डलानि भवन्ति। तत्रादावेव परमतेन वीथीनां लक्षणमाह—
नागगजैरावतवृषभभोजरद्गवमृगाजदहनाख्याः ।
अश्विन्याद्याः कैश्चित्त्रिभाः क्रमाद्वीथयः कथिताः ॥१॥
शुक्र की नव वीथियाँ, तीन मार्ग एवं छः मण्डल होते हैं। उनमें मतान्तर से प्रथमतः
वीथियों के नक्षत्रों को कहते हैं—
अश्विनी आदि तीन-तीन नक्षत्रों में क्रम से नाग, गज, ऐरावत, वृष, गो, जरद्गव, मृग,
अज, दहन—ये नव वीथियाँ होती हैं। जैसे—अश्विनी, भरणी और कृत्तिका में नागवीथि;
रोहिणी, मृगशिर और आर्द्रा में गजवीथि; पुनर्वसु, पुष्य और आश्लेषा में ऐरावतवीथि;
मघा, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरफाल्गुनी में वृषवीथि; हस्त, चित्रा और स्वाती में गोवीथि;
विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा में जरद्गववीथि; मूल, पूर्वाषाढा और उत्तराषाढा में मृगवीथि;
श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा में अजवीथि तथा पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा और रेवती में
दहन नाम की वीथि होती है॥१॥
स्फुटार्थ चक्र

वीथियाँनागगजऐरावतवृषगौजरद्गवमृगअजदहन
नअश्विनीरोहिणीपुनर्वसुमघाहस्तविशा.मूलश्रवणपू. भा.
क्षभरणीमृगशिरापुष्यपू.फा.चित्राअनुरा.पू. षा.धनिष्ठाउ. भा.
त्रकृत्तिकाआर्द्राआश्लेषाउ.फा.स्वातीज्येष्ठाउ. षा.शतभि.रेवती

नागवीथी प्रथमा। गजवीथी द्वितीया। ऐरावतवीथी तृतीया। वृषभवीथी चतुर्थी।
गोवीथी पञ्चमी। जगद्गववीथी षष्ठी। मृगवीथी सप्तमी। अजवीथी अष्टमी। दहनवीथी
नवमी। एता नव वीथयः कैश्चिदाचार्यैर्देवलप्रभृतिभिरश्विन्याद्यास्त्रिभास्त्रिभिर्भैर्नक्षत्रैः कथिता।
अश्विनीभरणीकृत्तिका नागवीथी। रोहिणीमृगशिरआर्द्रा गजवीथी। पुनर्वसुतिष्याश्लेषा
ऐरावतवीथी। एवं क्रमेण त्रिभिस्त्रिभिर्नक्षत्रैरन्या अपि ज्ञेयाः। एताः क्रमात् परिपाट्या
वीथयः कथिता उक्ताः। तथा च देवलः—
अश्विन्यादित्रिभाः सर्वा नागाद्या दहनान्तिकाः।
वीथयो भृगुपुत्रस्य नव प्रोक्ताः पुरातनैः॥
तथा च काश्यपः—