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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

१७० बृहत्संहिता
पापग्रहविरहितैर्लोके शुभं फलं भवति। देहे क्रूरनिपीडित इति। क्रूरग्रहा रविभौमसौराः।
देहे तनौ कृत्तिकारोहिण्योरित्यर्थः। क्रूरनिपीडिते क्रूरहते तयोर्यदि पापाः स्थितास्तदा अग्न्य-
निलजं भयं भवति। अग्निर्मुहुतवहः, अनिलो वायुः, अनयोर्जातम्। तथा नाभ्यां पीडिताया-
मषाढाद्वय इत्यर्थः। क्षुत्कृतं दुर्भिक्षभयं भवति। पुष्ये मघायां पीडितायां मूलफलक्षयः, मूलानां
मूलद्रव्याणां फलानां चाम्रादीनां क्षयो विनाशो भवति। अथशब्दः स्वार्थे। हृदये आश्ले-
षायां पीडितायां ध्रुवमवश्यं सस्यस्य धान्यस्य नाशः क्षयो भवति। तथा च काश्यपः—
कृत्तिका रोहिणी चोभे संवत्सरतनुः स्मृता।
आषाढाद्वितयं नाभी सार्पं हृत्कुसुमं मघा।।
क्रूरग्रहहते देहे दुर्भिक्षानलमारुताः।
क्षुद्भयं तु भवेन्नाभ्यां पुष्ये मूलफलक्षयः।।
हृदये सस्यहानिः स्यात् सौम्यैः पुष्टिः प्रकीर्तिता।। इति।।१९।।
अधुना षष्ट्यब्दानयनमाह—
गतानि वर्षाणि शकेन्द्रकाला-
द्धतानि रुद्रैर्गुणयेच्चतुर्भिः।
नवाष्टपञ्चाष्ट८५८९युतानि कृत्वा
विभाजयेच्छून्यशरागरामैः ३७५० ॥२०॥
लब्धेन युक्तं शकभूपकालं
संशोध्य षष्ट्या विषयैर्विभज्य।
युगानि नारायणपूर्वकाणि
लब्धानि शेषाः क्रमशः समाः स्युः ॥२१॥
एकैकमब्देषु नवाहतेषु दत्त्वा पृथग् द्वादशकं क्रमेण।
हृत्वा चतुर्भिर्वसुदेवताद्यान्युडूनि शेषांशकपूर्वमब्दम् ॥२२॥
शकादित्य (शालिवाहन) नृप के समय से जितने वर्ष बीते हों, उनको ग्यारह से
गुणा कर गुणनफल को फिर चार से गुणा करे। उस गुणनफल में ८५८९ जोड़कर ३७५०
से भाग देने पर जो लब्धि मिले, उसमें शकाब्द जोड़ कर ६० का भाग देने पर जो शेष बचे,
उसमें पाँच का भाग दे। लब्ध गत युग और शेष वर्तमान युग के वर्ष आदि होंगे एवं उक्त
वर्षों की संख्या को १२ से भाग दे और भागफल को नवगुणित अङ्क में मिलाकर ४ का
भाग करने पर जो लब्धि हो, उतनी संख्या के नक्षत्रों में बृहस्पति की मान्यता समझे; परन्तु
गणना के समय २४ वें नक्षत्र से गणना करनी चाहिए अर्थात् १ लब्धि हो तो २५वाँ
(पूर्वाभाद्रपद) और २ लब्धि हो तो २६वाँ (उत्तराभाद्रपदा) नक्षत्र समझना चाहिये।
उदाहरण—जैसे शाके १८७६ में संवत्सर का आनयन करना है तो १८७६ को ११
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