बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबृहस्पतिचाराध्यायः १६९
धूमाभेऽनावृष्टिस्त्रिदशगुरौ नृपवधो दिवा दृष्टे ।
विपुलेऽमले सुतारे रात्रौ दृष्टे प्रजाः स्वस्थाः ॥१८८॥
यदि बृहस्पति अग्निवर्ण का हो तो अग्नि का भय, पीतवर्ण का हो तो व्याधि,
श्यामवर्ण का हो तो युद्ध, हरा हो तो चोरों से पीड़ा, लालवर्ण का हो तो शस्त्र का भय और
धूमवर्ण का हो तो अनावृष्टि करता है। यदि बृहस्पति दिन में दिखाई दे तो राजा का नाश
और ताराओं से सुन्दर रात्रि में बृहस्पति का विपुल निर्मल विम्ब दिखाई दे तो प्रजाओं को
सर्वथा स्वस्थ करता है॥१८८॥
त्रिदशगुरौ देवाचार्ये बृहस्पतावनलवर्णेऽग्निप्रभेऽनलभयमग्निभीतिर्भवति। पीते पीतवर्णे
व्याधिः पीडा। श्यामे श्यामवर्णे रणागमः संग्रामः। हरते हरितवर्णे शुकाभे तस्करेभ्यश्चौरेभ्यः
पीडोपतापो लोकानां भवति। रक्ते लोहितवर्णे शस्त्रभयम्।
धूमाभे धूमप्रभे अनावृष्टिरवर्षणम्। दिवा दिवसभागे दृष्टे नृपवधो राज्ञो मृत्युर्भवति।
तथा च पराशरः—
कदाचिद्यत्र दृश्येत दिवा देवपुरोहितः।
राजा वा म्रियते तत्र स देशो वा विनश्यति।।
विपुले महाबिम्बे। अमले निर्मले। सुतारे शोभनतारे। रात्रौ निशि। दृष्टे प्रजा लोकाः
स्वस्था नीरोगा भवन्ति। केचिन्नृपाः स्वस्था इति पठन्ति॥१८८॥
अथ संवत्सरपुरुषमाह—
रोहिण्योऽनलभं च वत्सरतनुर्नाभिस्त्वषाढाद्वयं
सार्पं हृत्पितृदैवतं च कुसुमं शुद्धैः शुभं तैः फलम् ।
देहे क्रूरनिपीडितेऽग्न्यनिलजं नाभ्यां भयं क्षुत्कृतं
पुष्पे मूलफलक्षयोऽथ हृदये सस्यस्य नाशो ध्रुवम् ॥१९१॥
संवत्सरपुरुष के रोहिणी और कृत्तिका नक्षत्र शरीर, पूर्वाषाढा और उत्तराषाढा नाभि,
आश्लेषा हृदय और मघा पुष्प हैं। यदि संवत्सरपुरुष के ये शरीर आदि अङ्ग शुद्ध
( पापग्रह से रहित ) हों तो शुभ फल देते हैं। यदि देह ( रोहिणी और कृत्तिका ) में पाप
ग्रह हो तो अग्नि और वायु का भय, नाभि ( पूर्वाषाढा और उत्तराषाढा ) में पाप ग्रह हो तो
दुर्भिक्ष का भय, पुष्प ( मघा ) में पाप ग्रह हो तो मूल ( मूल पदार्थ ) और फल ( आम्र
आदि ) का क्षय तथा हृदय ( आश्लेषा नक्षत्र ) में पाप ग्रह हो तो धान्यों का नाश होता
है॥१९१॥
रोहिण्योऽनलभं कृत्तिकाः। एते द्वे नक्षत्रे संवत्सरतनुः संवत्सरपुरुषस्य शरीरम्।
अषाढाद्वयं पूर्वाषाढोत्तराषाढे तस्यैव नाभिः। सार्पमाश्लेषा हृत् हृदयम्। पितृदैवतं मघा
कुसुमं पुष्पमिति। प्रयोजनमप्याह—शुद्धैः शुभं तैः फलमिति । तैस्तन्वादिभिः शुद्धैः
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