बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 728 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ बृहत्संहिता
भूत्वा यदि तिष्ठेत्तदा स ग्रासो निरोधसंज्ञो विज्ञेयो ज्ञातव्यः। स च सर्वभूतानां निःशेषप्राणिनां
प्रमोदकृत् हर्षकृत् ।।४७।।
अथावमर्दनमाह—
अवमर्दनमिति निःशेषमेव सञ्छाद्य यदि चिरं तिष्ठेत् ।
हन्यात् प्रधानभूपान् प्रधानदेशांश्च तिमिरमयः ।।४८।।
यदि सूर्य या चन्द्रमण्डल के सम्पूर्ण बिम्ब को ढककर राहु बहुत काल तक स्थिर रहे
तो ‘अवमर्द’ नामक ग्रास होता है। यह प्रधान राजा और देश का नाश करता है।।४८।।
तिमिरमयो राहुर्निःशेषं समग्रमेव मण्डलं सञ्छाद्य स्थगयित्वा यदि चिरं बहुकालं
तिष्ठेत् तदाऽवमर्दनं नाम ग्रासस्तेन ग्रासेन प्रधानभूपान् प्रधानानृपान् प्रधानांश्च देशान्
हन्याद् घातयेत्।।४८।।
अथाऽऽरोहणस्याह—
वृत्ते ग्रहे यदि तमस्तत्क्षणमावृत्य दृश्यते भूयः ।
आरोहणमित्यन्योऽन्यमर्दनैर्भयकरं राज्ञाम् ।।४९।।
यदि सूर्य या चन्द्र के ग्रहण के बाद उसी क्षण में पुनः राहु ( ग्रहण ) दिखाई दे तो
‘आरोहण’ नामक ग्रास होता है। यह राजाओं में परस्पर संघर्ष उत्पन्न कर भयंकर स्थिति
लाता है।
विशेष—यह आरोहण नामक ग्रास गणित से नहीं आ सकता। जब कभी अचानक
ऐसी स्थिति दृष्टिगोचर हो तो उसको उत्पातरूप ही समझना चाहिये। आचार्य ने पूर्व-
शास्त्रानुसार यह लक्षण यहाँ पर बताया है।।४९।।
ग्रहे ग्रहणे वृत्ते निवृत्तेऽतिक्रान्ते भूयः पुनर्यदि चेत्तमो राहुस्तत्क्षणमावृत्य पुनश्छादयन्
तिष्ठेत् तदाऽऽरोहणं नाम ग्रासः। तच्च राज्ञां नृपाणामन्योऽन्यमर्दनैः परस्परावमर्दनैर्भयं भीतिं
करोति। इतिशब्दः प्रकारार्थे। एतदौत्पातिकम्। यतो नोत्पद्यते गणितगोलवासनया। आचार्येण
पूर्वशास्त्रानुसारेणोक्तम् ।।४९।।
अथाऽऽघ्रातस्याह—
दर्पण इवैकदेशे सबाष्पनिःश्वासमारुतोपहतः ।
दृश्येताऽऽघ्रातं तत् सुवृष्टिवृद्ध्यावहं जगतः ।।५०।।
यदि वाष्पयुत निःश्वासवायु से मलिन दर्पण की तरह सूर्य या चन्द्रमण्डल का एक देश
दिखाई दे तो ‘आघ्रात’ नामक ग्रास होता है। यह वृष्टि और प्राणियों की वृद्धि करता है।।५०।।
दर्पण आदर्श इवैकदेशे एकस्मिन् स्थाने सबाष्पेण सोष्मणा निःश्वासमारुतेन श्वास-
वायुना चोपहतो दृश्येताऽवलोक्येत तदाऽऽघ्रातं नाम ग्रासः। तच्च जगतः सुवृष्टिवृद्ध्यावहं
शोभनां वृष्टिं वृद्धिं च वहति जगतो जनपदस्य।।५०।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA