बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० बृहत्संहिता
षष्ठे तु सस्यकविलेखकगेयसक्तान्
हन्त्यश्मकत्रिपुरशालियुतांश्च देशान् ॥३९॥
यदि सिंह राशि में स्थित सूर्य या चन्द्र का ग्रहण हो तो पुलिन्दों (म्लेच्छ जातियों)
का समूह, मेकल ( पर्वतविशेष ) में निवास करने वाले, बलवान जन्तु, राजा और राजा के
समान तथा वन में निवास करने वाले मनुष्य पीड़ित होते हैं। यदि कन्या राशि में स्थित
सूर्य या चन्द्र का ग्रहण हो तो धान्य, कवि, लेखक, गानविद्या जानने वाले, पत्थर से आजीविका
चलाने वाले, त्रिपुर नामक देश और धान्ययुत प्रदेश—इन सबों का नाश करता है।।३९।।
पुलिन्दा निषादा जनाः, गणाः समूहाः, मेकला जनाः, सत्त्वयुक्ताः सत्त्वप्रधानाः,
राजोपमा राजन्यतुल्या वित्तप्रतिपत्तियुक्ताः, नरपतयो राजानः, वनगोचरा वनमरण्यं
गोचरो विषयो येषां ते वनगोचरा वनवासिन इत्यर्थः। एतान् सिंहे हन्ति।
षष्ठ इति। सस्यानि प्रसिद्धानि, कवयः पण्डिताः, लेखका लेखज्ञाः, गेयसक्ता
गेयरताः, अश्मका जनाः, त्रिपुरा देशाः, शालियुता देशा येषु शालयो धान्यानि बहूनि
भवन्ति, एतान् सर्वान् षष्ठे कन्यायां हन्ति।।३९।।
अथ तुलावृश्चिकयोराह—
तुलाधरेऽवन्त्यपरान्त्यसाधूँन् वणिग्दशार्णान् मरुकच्छपांश्च।
अलिन्यथोदुम्बरमद्रचोलान् द्रुमान् सयौधेयविषायुधीयान् ॥४०॥
यदि तुला राशि में स्थित सूर्य या चन्द्र का ग्रहण हो तो अवन्तिदेश में निवास करने
वाले, पश्चिम समुद्र के निकट रहने वाले, सज्जन तथा व्यापारी, दशार्ण, मरु और कच्छ
देश में रहने वाले—इन सबों का नाश करता है। यदि वृश्चिक राशि में स्थित सूर्य या चन्द्र
का ग्रहण हो तो उदुम्बर, मद्र और चोल देश में निवास करने वाले मनुष्य, वृक्ष, युद्ध करने
वाले मनुष्य, कठोर शस्त्र धारण करने वाले—इन सबों का नाश करता है।।४०।।
अवन्ती आवन्त्या जनाः, अपरान्त्या जना एव, साधवः सज्जनाः, वणिजः किराटाः,
दशार्णा जना एतान् मरुकच्छपांश्च—एतान् सर्वान् तुलाधरे तुले हन्ति।
अलिन्यथेति। उदुम्बरा जनाः, मद्राः, चोला—एतानपि जनान्, द्रुमान् वृक्षान्, यौधे-
यान् जनान्, विषायुधीयान् विषमायुधं येषां तान् सह यौधेयैर्विषायुधीयान्—एतानलिनि
वृश्चिके हन्ति।।४०।।
अथ धनुर्मकरयोराह—
धन्विन्यमात्यवरवाजिविदेहमल्लान्
पाञ्चालवैद्यवणिजो विषमायुधज्ञान्।
हन्त्यान्मृगे तु झषमन्त्रिकुलानि नीचान्
मन्त्रौषधीषु कुशलान् स्थविरायुधीयान् ॥४१॥
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