बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 728 में से
संदर्भ में पढ़ें११० बृहत्संहिता
दिनवृन्दात्खशर५०घ्नात् षण्णवरविभि१२९६र्भाजितादाप्तम्।
रामर्तुखेन्दु१०६३सहितं क्षिपेद् द्युवृन्दे भजेत्खधृतिभि१८०स्तत्॥
लब्धः कमलजपूर्वः पर्वगणः सप्तभाजितः शेषः।
गतगम्ये ते शून्यधृत्यूने चन्द्रसूर्यपर्व स्यात्॥
अत्र यल्लब्धं तदतीतं स्यात्ततः परं वर्तमानं भवति इति॥१९॥
अथ तेषां फलान्याह—
ब्राह्मे द्विजपशुवृद्धिः क्षेमारोग्याणि सस्यसम्पच्च।
तद्वत्सौम्ये तस्मिन् पीडा विदुषामवृष्टिश्च॥२०॥
ऐन्द्रे भूपविरोधः शारदसस्यक्षयो न च क्षेमम्।
कौबेरेऽर्थपतीनामर्थविनाशः सुभिक्षं च॥२१॥
वारुणमवनीशाशुभमन्येषां क्षेमसस्यवृद्धिकरम्।
आग्नेयं मित्राख्यं सस्यारोग्याभयाम्बुकरम्॥२२॥
याम्यं करोत्यवृष्टिं दुर्भिक्षं संक्षयं च सस्यानाम्।
यदतः परं तदशुभं क्षुन्मारावृष्टिदं पर्व॥२३॥
यदि ब्राह्मपर्व में ग्रहण हो तो ब्राह्मण और पशुओं की उन्नति, कुशल, आरोग्य तथा
धान्यों की वृद्धि होती है। चान्द्रपर्व में भी इसी तरह ब्राह्मण और पशुओं की उन्नति, कुशल,
आरोग्य, धान्यों की वृद्धि, पण्डितों को पीड़ा तथा अनावृष्टि होती है। ऐन्द्रपर्व में राजाओं
में विरोध, शारदीय धान्य का नाश और लोगों में अकुशल होता है। कौबेरपर्व में धनपतियों
के धन की क्षति और सुभिक्ष होता है। वारुणपर्व में राजाओं का अशुभ, दूसरे लोगों का
कुशल और धान्यों की वृद्धि होती है। आग्नेयपर्व को 'मित्र' भी कहते हैं; इसमें धान्य की
वृद्धि, आरोग्य, अभय और वृष्टि होती है। याम्यपर्व में वर्षा का अभाव, दुर्भिक्ष और धान्यों
का नाश होता है। इन सात पर्वों से भिन्न पर्व अशुभ फल देने वाले होते हैं। जैसे कि छः-
छः मास वृद्धि करके सात पर्वेश कहे गये हैं; इनमें किसी समय उत्पातवश पाँच, साढे
पाँच, साढे छः या सात मास आदि पर ही पर्व की उपस्थिति हो जाती है। ऐसी स्थिति में
पूर्वकथित ब्रह्मा आदि सात पर्व नहीं होते। इनसे अतिरिक्त पर्वों में दुर्भिक्ष, मरकी और
अनावृष्टि होती है॥२०-२३॥
ब्राह्मे द्विजपशुवृद्धिः क्षेमारोग्याणीति। ब्राह्मे पर्वणि द्विजानां ब्राह्मणादीनां पशूनां
चतुष्पदानां वृद्धिवर्द्धनम्, तथा क्षेमं लब्धपालनम्, आरोग्यं नीरोगत्वम्, एतानि भवन्ति।
सस्यानां च सम्पद्वृद्धिर्भवति।
तद्वत्सौम्य इति। सौम्ये पर्वणि चान्द्रे तद्वद् द्विजपशुवृद्धिक्षेमारोग्याणि भवन्ति। सस्य-
सम्पच्च भवति। तस्मिन् सौम्ये तु पुनर्विदुषां पण्डितानां पीडा। अवृष्टिरवर्षणं भवति।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA