बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराहुचाराध्यायः १०१
भगणार्द्धेन राशिषट्केनान्तरितौ व्यवहितौ सूर्याचन्द्रमसौ गृह्णाति। किलास्य तिस्रो लिप्ता
एकादशविलिप्ताश्च गणितस्कन्धोक्ता नियता गतिर्यस्य नियतचारस्तस्य षड्राश्यन्तरिता
गतिर्न सम्भाव्यते अर्कादीनां यथेति ।। ४ ।।
अन्यद् दूषणान्तरमाह—
अनियतचारः खलु चेदुपलब्धिः संख्यया कथं तस्य ।
पुच्छाननाभिधानोऽन्तरेण कस्मान्न गृह्णाति ।। ५ ।।
यदि राहु अनिश्चित गति वाला होता तो गणित से उसका ज्ञान कैसे हो सकता था?
अथवा यदि मुख-पुच्छ-विभक्ताङ्ग वाला होता है तो अपने से दूसरी, तीसरी, चौथी या
पाँचवीं राशि पर स्थित रवि-चन्द्र को क्यों नहीं ग्रसता है ।। ५ ।।
यद्यसौ राहुरनियतचारोऽनिश्चितगतिः केत्वादिरिव तत्कथं तस्य संख्यया गणितेनो-
पलब्धिरुपलम्भनम्। कथं ज्ञायते यथास्मिन् राशौ राहुरवस्थित इति।
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