बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 728 में से
संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रचाराध्यायः ९३
मध्यतनुर्वज्राख्यः क्षुद्भयदः सम्भ्रमाय राज्ञां च ।
चन्द्रो मृदङ्गरूपः क्षेमसुभिक्षावहो भवति ॥१९॥
ज्ञेयो विशालमूर्तिर्नरपतिलक्ष्मीविवृद्धये चन्द्रः।
स्थूलः सुभिक्षकारी प्रियधान्यकरस्तु तनुमूर्तिः॥२०॥
यदि चन्द्रबिम्ब मध्यम हो तो वज्रसंज्ञक होता है। यह क्षुधा और भय को देने वाला
तथा राजाओं में उद्यम उत्पन्न करने वाला होता है। यदि चन्द्रबिम्ब मृदङ्ग की तरह दिखलाई
पड़े तो कल्याण और सुभिक्ष होता है। यदि अति विस्तृत मूर्ति के समान हो तो राजलक्ष्मी
की वृद्धि होती है। यदि मोटी मूर्ति के समान हो तो सुभिक्ष करने वाला और पतली मूर्ति
के समान हो तो प्रियधान्य ( सुभिक्ष ) करने वाला होता है॥१९-२०॥
मध्यतनुर्यो मध्यादवनतः स वज्राख्यो वज्रसंज्ञः। क्षुद्भयदः क्षुद्भयं दुर्भिक्षं ददाति।
राज्ञां नृपाणां च सम्भ्रमायोद्यमाय भवति। तथा च वृद्धगर्गः—
विलग्नमध्यो मेघाभो वज्रसंस्थानसंस्थितः।
मध्यच्छिद्रो विलीनो वा भयं च जनयेद् महत्॥
चन्द्रः शशी मृदङ्गरूपो मृदङ्गाकारः क्षेमसुभिक्षावहो भवति। क्षेमं सुभिक्षं च करोति।
चन्द्रः शशी विशालमूर्तिर्विस्तीर्णबिम्बो नरपते राज्ञो लक्ष्मीविवृद्धये श्रियो वृद्ध्यर्थं
ज्ञेयो ज्ञातव्यः। स्थूलो घनः सुभिक्षकारी सुभिक्षकृद्भवति। तनुमूर्तिरघनदेहः प्रियधान्यकरो
दुर्भिक्षकारी च भवति॥१९-२०॥
अथ चन्द्रस्य कुजादिभिस्ताराग्रहैः शृङ्गे भिन्ने फलमाह—
प्रत्यन्तान् कूनृपांश्च हन्त्युडुपतिः शृङ्गे कुजेनाहते
शस्त्रक्षुद्भयकृद्यमेन शशिजेनावृष्टिदुर्भिक्षकृत् ।
श्रेष्ठान् हन्ति नृपान् महेन्द्रगुरुणा शुक्रेण चाल्पान्नृपान्
शुक्ले याप्यमिदं फलं ग्रहकृतं कृष्णे यथोक्तागमम् ॥२१॥
यदि चन्द्रशृङ्ग मङ्गल से वेधित हो तो दूर देश में रहने वाले बड़े राजाओं का नाश
करने वाला होता है एवं शनि से वेधित होने पर शस्त्र और क्षुधा का भय करने वाला होता
है। इसी प्रकार बुध से वेधित होने पर श्रेष्ठ राजाओं का नाश करने वाला होता है तथा शुक्र
से वेधित होने पर छोटे राजाओं का नाश करने वाला होता है। यह पूर्वोक्त ग्रहकृत फल
शुक्ल पक्ष में थोड़ा और कृष्ण पक्ष में पूर्ण रूप से घटित होता है॥२१॥
चन्द्रस्य ताराग्रहैः सह संयोगे समागमाध्यायोक्तगणितविधिना ग्रहणवत्कर्मणि जाते
भूत्वाऽधोभागेन भौमादयो बिम्बभेदनं कुर्वन्ति। तत्र शृङ्गभेदने इदं फलं मध्यभेदने च
वक्ष्यमाणम्।
प्रत्यन्तानिति। उडुपतिश्चन्द्रः कुजेन भौमेन शृङ्गे विषाणे आहते ताडिते सति प्रत्यन्तान्
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA