बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदित्यचाराध्यायः ८१
अग्नि के परिताप से पीड़ित होकर जिस तरह सोना शुद्ध होता है, उसी तरह सूर्य के
परिताप से पीड़ित होकर नक्षत्र शुद्ध होता है॥३६॥
यस्मिन्नृक्षे नक्षत्रे दिनकरः सूर्यः स्थितस्तदृक्षं दिनकरकराभितापात्सूर्यरश्मिसन्तापात्
सुमहतीं पीडामतिरुजमवाप्नोति लभते। तदेव सूर्यमृक्षं पश्चादनन्तरं शुद्धं निर्दोषं भवति।
यथा कनकं सुवर्णं हुताशपरितापादग्निसन्तापेन शुद्धं निर्मलं भवति। तथा च पराशरः—
ग्रहोपसृष्टं नक्षत्रं सवितुर्योगमागतम्।
विशोधयति तत्पापं तुषाग्निरिव काञ्चनम्॥
तथा च वृद्धगर्गः—
यथाग्निना प्रज्वलिते गृहे तप्यन्त्यदूरिणः।
तथार्कस्याप्यदूरस्थमृक्षं तदपि तप्यते॥ इति॥३६॥
अथ प्रतिसूर्यलक्षणमाह—
दिवसकृतः प्रतिसूर्यो जलकृदुदग्दक्षिणे स्थितोऽनिलकृत्।
उभयस्थः सलिलभयं नृपमुपरि निहन्त्यधो जनहा॥३७॥
यदि सूर्यमण्डल की उत्तर दिशा में प्रतिसूर्य दिखलाई पड़े तो वृष्टि होती है, दक्षिण
दिशा में प्रतिसूर्य दिखलाई पड़े तो आँधी आती है, दोनों तरफ दिखलाई पड़े तो राजा का
और नीचे की तरफ दिखलाई पड़े तो वह प्रतिसूर्य लोगों का नाश करता है।
विशेष—सूर्योदय के बाद एक प्रहर तक जब एक छोटा मेघ का टुकड़ा आ जाता
है तब वह सूर्य की किरणों से चमकता हुआ द्वितीय सूर्य के समान लक्षित होता है, उसी
को ‘प्रतिसूर्य’ कहते हैं॥३७॥
दिवसकृत इति। उदयात्प्रभृति दिनप्रहरैकं यावत्तनुघनोऽर्कसमीपे यदा भवति
तदार्करश्मिवशात्तत्र द्वितीयोऽर्क इव लक्ष्यते, स प्रतिसूर्य उच्यते। एवमस्तमयेऽपि सम्भवति।
दिवसकृतः स प्रतिसूर्यः। आदित्यस्योदगुत्तरे यदा प्रतिसूर्यो दृश्यते तदा जलकृज्जलं
पानीयं करोति पर्जन्यवृष्टिर्भवति। दक्षिणस्थोऽर्कस्य वातकरो भवति। उभयस्थ उत्तर-
दक्षिणभागयोर्द्वयोरपि स्थितः सलिलभयं जलभीतिं करोति। तस्यैवार्कस्योपरि स्थितः प्रति-
सूर्यो नृपं राजानं हन्ति घातयति। अधःस्थितः प्रतिसूर्यो जनहा जनान् हन्ति॥३७॥
अन्यदप्याह—
रुधिरनिभो वियत्यवनिपान्तकरो न चिरात्।
परुषरजोऽरुणीकृततनुर्यदि वा दिनकृत्॥३८॥
असितविचित्रनीलपरुषो जनघातकरः।
खगमृगभैरवस्वररुतैश्च निशाद्युमुखे॥३९॥
आकाश में रुधिर के समान लाल वर्ण या धूलि के समुदाय से लाल वर्ण का
सूर्यमण्डल राजा का बहुत जल्दी नाश करता है। यदि सूर्यमण्डल कृष्ण, विचित्र या नील
बृ० भ० प्र०-६
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