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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 728 में से

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पृष्ठ 115

आदित्यचाराध्यायः ७५
विशेषफलमाह—
दृश्यन्ते च यतस्ते रविबिम्बस्योत्थिता महोत्पाताः ।
आगच्छति लोकानां तेनैव भयं प्रदेशेन ॥२०॥
ये पूर्वकथित ध्वांक्ष आदि महा उत्पात सूर्यमण्डल में जिस तरफ दिखाई देते हैं, उस
दिशा में स्थित देशों के लोगों को भय होता है। जैसे—यदि उत्पात सूर्यबिम्ब में पूर्व तरफ
हो तो पूर्वीय देश में, दक्षिण की तरफ हो तो दक्षिणीय देश में, पश्चिम की तरफ हो तो
पश्चिमीय देश में और उत्तर की तरफ हो तो उत्तरीय देश में स्थित लोगों को भय होता है॥२०॥
ते महोत्पाता ध्वाङ्क्षप्रभृतयो रविबिम्बस्यार्कमण्डलस्योत्थिता उत्पन्ना यतो यस्यां
दिशि दृश्यन्ते, पूर्वस्यां दक्षिणस्यां पश्चिमायामुत्तरस्यां वा दिशि विदिक्षु वा तेनैव प्रदेशेन
लोकानां जनानां भयमागच्छति आयाति॥२०॥
अथार्करश्मिवशेन शुभाशुभफलमाह—
ऊर्ध्वकरो दिवसकरस्ताम्रः सेनापतिं विनाशयति ।
पीतो नरेन्द्रपुत्रं श्वेतस्तु पुरोहितं हन्ति ॥२१॥
चित्रोऽथवापि धूम्रो रविरश्मिर्व्याकुलं करोत्यूर्ध्वम् ।
तस्करशस्त्रनिपातैर्यदि सलिलं नाशु पातयति ॥२२॥
सूर्य के ऊपरी भाग की किरणें ताम्र वर्ण की हों तो सेनापति का, पीले वर्ण की हों तो
राजा के पुत्र का और श्वेत वर्ण की हों तो पुरोहित का नाश होता है। साथ चित्र या धूम्र वर्ण
की हों तो चोरों या शस्त्रप्रहारों से लोग व्याकुल होते हैं। यदि उक्त उत्पात देखने के बाद
जल्दी वृष्टि न हो तो पूर्वोक्त फल होता है। यदि वृष्टि हो जाय तो पूर्वोक्त फल न होकर
लोगों का कल्याण होता है॥२१-२२॥
दिवसकर आदित्यः । ऊर्ध्वकर ऊर्ध्वरश्मिर्यदा दृश्यते। अधोभागे तस्य रश्मयो न
दृश्यन्त इत्यर्थः । स च ताम्रस्ताम्रवर्णश्च तदा सेनापतिं चमूनाथम्, विनाशयति घातयति ।
ऊर्ध्वकरः पीतवर्णश्च नरेन्द्रपुत्रं नृपसुतम्, हन्ति मारयति। ऊर्ध्वकरः श्वेतवर्णश्च पुरोहितं
मारयति।
चित्रोऽथवेति । खेरादित्यस्य सम्बन्धी रश्मिः करः । ऊर्ध्वं स्थितः स च चित्रो नाना-
वर्णोऽथवापि तु धूम्रवर्णस्तस्करशस्त्रनिपातैः, तस्कराश्चौराः, शस्त्रमायुधम्, तैस्तस्करशस्त्र-
निपातैश्चौरसङ्ग्रामोपमर्दनैर्व्याकुलं सोद्यमं देशं करोति, यद्याशु शीघ्रं सलिलं जलं न
पातयति न वर्षति तदैवम्। अथ सलिलपातं करोति तदा शिवमिति॥२१-२२॥
अथ भगवतो भास्करस्य ऋतुवर्णलक्षणमाह—
ताम्रः कपिलो वार्कः शिशिरे हरिकुङ्कुमच्छविश्च मधौ ।
आपाण्डुकनकवर्णा ग्रीष्मे वर्षासु शुक्लश्च ॥२३॥
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