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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

७४ बृहत्संहिता
सूर्य के मण्डल में दण्ड की तरह केतु दिखाई दे तो राजा की मृत्यु, छिन्नमस्तक पुरुष
की तरह दिखाई दे तो व्याधि का भय, काक की तरह दिखाई दे तो चोर का भय और कील
की तरह दिखाई दे तो दुर्भिक्ष होता है।।१७।।
अर्कस्थे सूर्यमण्डलसंस्थिते। दण्डे दण्डाकारे चिह्ने। नरेन्द्रस्य राज्ञो मृत्युर्मरणं स्यात्।
कबन्धश्छिन्नशिराः पुरुषः। कबन्धसंस्थाने कबन्धाकारे चिह्नेऽर्कस्थे। व्याधिभयं रोगभयम्।
स्याद् भवेत्। ध्वाङ्क्षः काकस्तस्मिन्नर्कस्थे तस्करभयं चौरकृतं भयं वदेत्। कीलके कील-
काकारेऽर्कस्थे दुर्भिक्षमसुभिक्षं भवेत्।।१७।।
अन्यदप्याह—
राजोपकरणरूपैश्छत्रध्वजचामरादिभिर्विद्धः।
राजान्यत्वकृदर्कः स्फुलिङ्गधूमादिभिर्जनहा ।।१८।।
यदि सूर्यमण्डल राजा के उपकरणरूप छत्र, ध्वजा, चामर आदि से वेधित हो तो
राजा का परिवर्तन होता है और अग्निकण, धूम आदि से वेधित हो तो लोगों का नाश
करता है।।१८।।
राजा नृपस्तस्योपकरणानि हस्त्यश्वादयस्तद्रूपैस्तदाकारैरर्कः सूर्यो यदि विद्धो भवति।
तथा छत्रध्वजचामरादिभिः। छत्रमातपत्रम्। ध्वजं पताका। चामरं बालव्यजनम्। आदिग्रहणाद्
भृङ्गारकुम्भाकारैर्यद्यर्को विद्धो भवति तदा राजाऽन्यत्वकृत्, राज्ञोऽन्यत्वं करोति, अन्यो राजा
भवतीत्यर्थः। अथ स्फुलिङ्गैरग्निकणैर्धूमेन। आदिग्रहणाज्वालादिभिर्युक्तो भवति तदा
जनहा, जनान् हन्ति घातयतीत्यर्थः ।।१८।।
अन्यदप्याह—
एको दुर्भिक्षकरो द्व्याद्याः स्युर्नरपतेर्विनाशाय।
सितरक्तपीतकृष्णैस्तैर्विद्धोऽर्कोऽनुवर्णघ्नः ।।१९।।
यदि पूर्वोक्त सूर्यमण्डल के वेध करने वालों में से एक से सूर्य वेधित हो तो दुर्भिक्ष,
दो आदि से वेधित हो तो राजा का नाश और सफेद, लाल, पीला, काला—इन वर्णों से
वेधित हो तो क्रम से वर्णों का नाश करता है। जैसे—सफेद वर्ण से वेधित होने पर
ब्राह्मणों का, लाल वर्ण से वेधित होने पर क्षत्रियों का, पीले वर्ण से वेधित होने पर वैश्यों
का और काले वर्ण से वेधित होने पर शूद्रों का नाश करता है।।१९।।
एको वेधोऽर्कस्थो दुर्भिक्षमसुभिक्षं करोति। द्वावाद्यौ येषां ते द्व्याद्याः। द्वौ त्रयश्चत्वारो
वा वेधा नरपते राज्ञो विनाशायाभावाय स्युर्भवेयुः। अर्क आदित्यस्तैश्चिह्नैस्सितरक्तपीतकृष्णै-
र्विद्धोऽनुवर्णघ्नो भवति। अनु क्रमेण। वर्णान् द्विजादीन् हन्ति। तद्यथा—सितैः श्वेतवर्णै-
श्चिह्नैर्विद्धो ब्राह्मणान् हन्ति घातयति, रक्तवर्णैः क्षत्रियान्, पीतवर्णैर्वैश्यान्, कृष्णवर्णैः
शूद्रानिति।।१९।।
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